CourtOrder – लखनऊ जिला न्यायालय हिंसा मामले में हाईकोर्ट की सख्त कार्रवाई, चार अधिवक्ताओं के प्रवेश पर रोक
CourtOrder – लखनऊ जिला न्यायालय परिसर में 21 जुलाई को हुई हिंसक घटना पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्वतः संज्ञान लेते हुए कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने मामले में नामित चार अधिवक्ताओं के 24 अगस्त तक जिले के किसी भी न्यायालय परिसर में प्रवेश पर रोक लगाने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान मामले को गंभीर मानते हुए कई महत्वपूर्ण निर्देश भी जारी किए हैं।

घटना पर स्वतः संज्ञान और जनहित याचिका
यह कार्रवाई अधिवक्ता अभिप्सा मोहंती, कोमल अग्रवाल और आशुतोष श्रीवास्तव की ओर से प्रस्तुत आवेदन के आधार पर शुरू हुई। आवेदन में जिला न्यायालय परिसर में हुई हिंसा और उससे जुड़े घटनाक्रम का विस्तृत उल्लेख किया गया था। हाईकोर्ट ने इसे जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का निर्देश देते हुए मामले की व्यापक सुनवाई शुरू की। अदालत ने कहा कि न्यायालय परिसर में ऐसी घटनाएं न्याय व्यवस्था की गरिमा पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
अदालत ने जताई कानून व्यवस्था पर चिंता
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने जिला न्यायालय परिसर में सुरक्षा व्यवस्था और कथित अराजक गतिविधियों पर चिंता व्यक्त की। अदालत की टिप्पणी के अनुसार, कुछ अधिवक्ताओं के समूह पर संपत्ति विवादों में अनुचित हस्तक्षेप, दबाव बनाने और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने जैसे आरोप सामने आए हैं। न्यायालय ने कहा कि यदि ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती होगी।
पीड़ित से मारपीट और धमकी का आरोप
मामले में आरोप है कि दीवानी वाद के वादी मोहम्मद शाकिर के साथ न्यायालय परिसर में मारपीट की गई और उन्हें सेंट्रल बार एसोसिएशन कार्यालय तक ले जाकर मुकदमा वापस न लेने पर जान से मारने की धमकी दी गई। इस संबंध में वजीरगंज थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। बाद में मोहम्मद शाकिर स्वयं हाईकोर्ट पहुंचे और कथित हमले की जानकारी देते हुए न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष रखा।
रिपोर्ट और सीसीटीवी से हुई पहचान
खंडपीठ के समक्ष जिला न्यायाधीश तथा पुलिस आयुक्त की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट और उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज भी रखे गए। अदालत के अनुसार, इन दस्तावेजों के आधार पर चार अधिवक्ताओं की मुख्य आरोपियों के रूप में पहचान की गई। मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त को निर्धारित की गई है।
हथियार से फंसाने की कोशिश का भी आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि घटना के दौरान एक आरोपी अधिवक्ता के पास हथियार होने का आरोप है। यह भी दावा किया गया कि पीड़ित को झूठे आपराधिक मामले में फंसाने के उद्देश्य से हथियार उसके हाथ में देने का प्रयास किया गया। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि पुलिस थाने ले जाने से पहले पीड़ित को कई घंटे तक बार एसोसिएशन कार्यालय में रोके रखा गया। सरकारी पक्ष ने सुनवाई के दौरान कुछ आरोपितों के विरुद्ध दर्ज पुराने आपराधिक मामलों का भी उल्लेख किया।
हाईकोर्ट के प्रमुख निर्देश
हाईकोर्ट ने चारों अधिवक्ताओं को शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें पिछले दस वर्षों के आयकर रिटर्न, परिवार के सदस्यों का विवरण तथा बीते पांच वर्षों में संपत्ति, व्यवसाय और वित्तीय लेनदेन की जानकारी शामिल होगी। अदालत ने उनके सभी संबंधित दीवानी मामलों का ब्यौरा भी मांगा है, जिनमें वे पक्षकार या अधिवक्ता के रूप में शामिल हैं।
इसके अलावा, लखनऊ स्थित खुफिया ब्यूरो (IB) के संयुक्त निदेशक की निगरानी में चारों अधिवक्ताओं की गतिविधियों की गोपनीय जांच कराने का आदेश दिया गया है। जिला न्यायाधीश को संबंधित वादों के अभिलेख सील कर सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए हैं। आजमगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को वादी मोहम्मद शाकिर को अगली सुनवाई तक पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है। साथ ही पुलिस को यह भी जांचने के निर्देश दिए गए हैं कि क्या इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की संगठित अपराध से संबंधित धारा 111 लागू होती है। अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया, उत्तर प्रदेश बार काउंसिल, गृह मंत्रालय, विधि एवं न्याय मंत्रालय, उत्तर प्रदेश पुलिस, आयकर विभाग और सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ को भी मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है।