Bombay High Court – एसडीपीआई पदाधिकारियों के तड़ीपार आदेश पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक
Bombay High Court- मुंबई पुलिस द्वारा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के दो पदाधिकारियों के खिलाफ जारी तड़ीपार आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि उपलब्ध रिकॉर्ड और दर्ज मामलों के आधार पर इस तरह की कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार दिखाई नहीं देता। दोनों याचिकाकर्ताओं को दिसंबर 2025 में जारी आदेश के तहत एक वर्ष के लिए मुंबई से बाहर रहने का निर्देश दिया गया था।

अदालत ने चयनात्मक कार्रवाई पर उठाए सवाल
जस्टिस माधव जामदार की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि जिन प्रदर्शनों के आधार पर कार्रवाई की गई, उनमें विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी शामिल थे। ऐसे में केवल दो व्यक्तियों के खिलाफ तड़ीपार की कार्रवाई किए जाने पर अदालत ने सवाल उठाए। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि कानून का उपयोग समान परिस्थितियों में सभी पर समान रूप से होना चाहिए और किसी विशेष समूह को अलग से निशाना नहीं बनाया जा सकता।
किन मामलों के आधार पर जारी हुआ था आदेश
रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों याचिकाकर्ताओं फिरोज अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी के खिलाफ 2024 और 2025 के दौरान दर्ज तीन मामलों को आधार बनाकर कार्रवाई की गई थी। इनमें वक्फ विधेयक के विरोध में प्रदर्शन, चेंबूर-गोवंडी क्षेत्र में सीमेंट गोदामों से जुड़े वायु प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन तथा बाबरी मस्जिद से जुड़े विरोध कार्यक्रम शामिल थे।
याचिकाकर्ताओं की ओर से क्या कहा गया
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता इब्राहिम हरबत ने अदालत में दलील दी कि महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 के तहत तड़ीपार जैसी कार्रवाई तभी की जा सकती है, जब किसी व्यक्ति से सार्वजनिक सुरक्षा या संपत्ति को वास्तविक खतरे की आशंका हो। उनका कहना था कि उपलब्ध मामलों में ऐसी कोई परिस्थिति सामने नहीं आती, जिससे इस प्रावधान का उपयोग उचित माना जा सके।
अदालत ने दर्ज मामलों का किया परीक्षण
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्राथमिकी के विवरण का उल्लेख करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में मुख्य रूप से नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन का जिक्र है। कहीं भी हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या किसी व्यक्ति पर हमले जैसी बात सामने नहीं आई। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल जांच लंबित होने या आशंकाओं के आधार पर किसी नागरिक के आवागमन के अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता।
बाबरी मस्जिद पर टिप्पणी भी बनी चर्चा का विषय
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि किसी ऐतिहासिक घटना या विवाद पर व्यक्तिगत राय रखना अपने आप में राष्ट्रविरोधी नहीं माना जा सकता। अदालत के अनुसार, किसी नागरिक को अपनी वैचारिक राय रखने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, जब तक वह कानून का उल्लंघन नहीं करता। इस आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ कठोर प्रशासनिक कार्रवाई करना उचित नहीं माना जा सकता।
सरकारी पक्ष की दलील और अदालत का रुख
राज्य सरकार की ओर से पेश मुख्य सरकारी वकील ने याचिकाकर्ताओं के कथित तौर पर प्रतिबंधित संगठन पीएफआई से संबंध होने का उल्लेख किया। हालांकि अदालत ने कहा कि यह आरोप मूल कारण बताओ नोटिस का हिस्सा नहीं था, इसलिए तड़ीपार आदेश को सही ठहराने के लिए इसका सहारा नहीं लिया जा सकता। अदालत ने यह भी दोहराया कि तड़ीपार जैसी कार्रवाई असाधारण प्रकृति की होती है और इसे केवल कानून में निर्धारित मानकों के अनुरूप ही लागू किया जाना चाहिए।
पहले के फैसले का भी दिया संदर्भ
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक पूर्व मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें एसडीपीआई के एक अन्य पदाधिकारी के खिलाफ जारी तड़ीपार आदेश को निरस्त किया गया था। अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले में भी उपलब्ध तथ्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर जारी आदेश टिकाऊ नहीं हैं। इसी कारण दोनों याचिकाओं को स्वीकार करते हुए मुंबई पुलिस के तड़ीपार आदेश को रद्द कर दिया गया।