स्वास्थ्य

HealthyAging – सक्रिय जीवनशैली और बेहतर पोषण से बढ़ सकती है बुजुर्गों की उम्र

HealthyAging – बढ़ती उम्र के साथ शरीर की कार्यक्षमता में कमी आना सामान्य माना जाता है, लेकिन हालिया शोध यह संकेत दे रहा है कि सिर्फ दवाइयों के भरोसे स्वस्थ वृद्धावस्था संभव नहीं है। मानसिक सक्रियता, संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधियां बुजुर्गों की लंबी उम्र में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। एक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जिन वरिष्ठ नागरिकों का दिमाग सक्रिय रहता है और जो रोजमर्रा की गतिविधियों में जुड़े रहते हैं, उनमें समय से पहले मृत्यु का खतरा अपेक्षाकृत कम पाया गया।

शोध में सामने आए अहम निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित इस अध्ययन में भारत के 60 वर्ष या उससे अधिक आयु वाले लोगों के स्वास्थ्य आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि बेहतर सोचने-समझने की क्षमता, अच्छा पोषण और शरीर की गतिशीलता लंबे जीवन से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। अध्ययन में शामिल विशेषज्ञों ने कहा कि उम्रदराज लोगों के लिए केवल बीमारी का इलाज पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी संपूर्ण कार्यक्षमता को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

यह अध्ययन एम्स, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा ट्रस्ट और ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल्स ससेक्स से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया। इसमें भारत में वृद्धावस्था से जुड़े आंकड़ों का उपयोग किया गया, जिनमें 4 हजार से अधिक बुजुर्गों की स्वास्थ्य स्थिति का मूल्यांकन शामिल था।

4 हजार से अधिक बुजुर्गों के आंकड़ों का विश्लेषण

शोध के दौरान 4,096 बुजुर्गों के स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े पहलुओं का अध्ययन किया गया। अध्ययन समाप्त होने तक इनमें से 951 लोगों की मृत्यु हो चुकी थी। विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों की मानसिक क्षमता, पोषण स्तर, चलने-फिरने की स्थिति, दृष्टि, सुनने की क्षमता और मनोदशा जैसे कई पहलुओं की जांच की।

विश्लेषण में यह सामने आया कि जिन लोगों की आंतरिक क्षमताएं कमजोर थीं, उनमें मृत्यु का जोखिम तेजी से बढ़ता गया। एक क्षमता प्रभावित होने पर जोखिम करीब 48 प्रतिशत तक बढ़ा, जबकि कई क्षमताओं में गिरावट आने पर यह खतरा दोगुने से भी अधिक दर्ज किया गया।

मानसिक सक्रियता और शरीर की गतिशीलता पर जोर

विशेषज्ञों के अनुसार, तेज दिमाग और सक्रिय शरीर वृद्धावस्था में सुरक्षा कवच की तरह काम कर सकते हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि जो बुजुर्ग नियमित रूप से हल्की शारीरिक गतिविधियां करते रहे और सामाजिक रूप से जुड़े रहे, उनमें स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं कम देखने को मिलीं।

शोधकर्ताओं ने कहा कि भारत जैसे देशों में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में स्वास्थ्य नीतियों का फोकस केवल बीमारियों के इलाज तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समय रहते कमजोरी और विकलांगता के शुरुआती संकेत पहचानने से बेहतर देखभाल संभव हो सकती है।

समय पर पहचान से मिल सकती है राहत

अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बुजुर्गों की नियमित जांच में मानसिक क्षमता, पोषण और शारीरिक सक्रियता को भी शामिल किया जाए, तो गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को शुरुआती चरण में रोका जा सकता है। इससे वृद्ध लोगों की जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इस विषय पर अभी सीमित शोध हुए हैं। ऐसे में भारत में सामने आए ये निष्कर्ष आने वाले समय में बुजुर्गों की देखभाल और स्वास्थ्य योजनाओं को नई दिशा दे सकते हैं।

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