CinemaReview – विवादित मुद्दों को छूती फिल्म लेकिन असर छोड़ने में चूकी…
CinemaReview – देश की राजनीति और वैचारिक संगठनों पर आधारित फिल्में हमेशा चर्चा का विषय बनती रही हैं। इसी कड़ी में आई फिल्म ‘आखिरी सवाल’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े ऐतिहासिक विवादों को कहानी के केंद्र में रखती है। फिल्म खुद को एक वैचारिक बहस के रूप में पेश करती है, जहां सवाल, तर्क और इतिहास एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं। हालांकि गंभीर विषय उठाने के बावजूद फिल्म हर मोड़ पर दर्शकों को पूरी तरह बांध पाने में सफल नहीं हो पाती।

कॉलेज बहस से शुरू होती है कहानी
फिल्म की शुरुआत प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी और उनके छात्र विक्की हेगड़े के बीच तीखी बहस से होती है। छात्र संघ को लेकर सवाल उठाता है और उसे देशविरोधी विचारधारा से जोड़ने की कोशिश करता है। प्रोफेसर इस दावे को खारिज कर देते हैं, जिसके बाद विवाद बढ़ जाता है। मामला कॉलेज परिसर से निकलकर सार्वजनिक बहस का रूप ले लेता है।
कहानी में असली मोड़ तब आता है जब छात्र संघ से जुड़े पांच बड़े सवाल प्रोफेसर के सामने रखता है। इन सवालों के जरिए महात्मा गांधी की हत्या, बाबरी मस्जिद विध्वंस, संगठन पर लगे प्रतिबंध और कई पुराने विवादों को चर्चा में लाया जाता है। फिल्म इन्हीं सवालों और जवाबों के सहारे आगे बढ़ती है। शुरुआती बहस कैंपस में दिखाई गई है, जबकि बाद के सवाल लाइव टीवी डिबेट में सामने आते हैं।
अभिनय में कुछ किरदारों ने छोड़ी छाप
प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी के किरदार में संजय दत्त कई जगह प्रभावशाली नजर आते हैं। उनके संवाद और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को मजबूती देते हैं। हालांकि कुछ दृश्यों में उनका अभिनय जरूरत से ज्यादा नाटकीय महसूस होता है। गुस्से वाले सीन में उनका अंदाज कई बार किरदार से ज्यादा अभिनेता की छवि को सामने लाता है।
वहीं छात्र विक्की हेगड़े की भूमिका निभाने वाले नमाशी चक्रवर्ती ने संतुलित अभिनय किया है। उन्होंने एक आक्रोशित लेकिन तर्क देने वाले युवा की भूमिका को सहजता से निभाया। अमित साध और नीतू चंद्रा सीमित समय में ठीक-ठाक प्रभाव छोड़ते हैं। समीरा रेड्डी का किरदार फिल्म में अलग अंदाज लेकर आता है और उनके नकारात्मक शेड्स दर्शकों का ध्यान खींचते हैं।
निर्देशन में गंभीरता तो दिखी, गहराई कम रही
निर्देशक ने एक संवेदनशील और विवादित विषय को उठाने का प्रयास किया है, जो अपने आप में चुनौतीपूर्ण माना जा सकता है। फिल्म की शुरुआती गति ठीक रहती है और दर्शक कहानी के साथ जुड़े रहते हैं। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, यह बहस आधारित प्रस्तुति में बदलने लगती है।
इतिहास और राजनीति जैसे गंभीर विषयों को जिस गहराई की जरूरत थी, वह कई हिस्सों में दिखाई नहीं देती। कई संवाद प्रभाव पैदा करने के बजाय सतही लगते हैं। फिल्म का क्लाइमैक्स जरूर एक नया सवाल छोड़ता है, लेकिन वहां तक पहुंचते-पहुंचते कहानी का प्रभाव कुछ कमजोर पड़ जाता है।
संगीत कहानी को मजबूत नहीं बना पाया
फिल्म का संगीत मोंटी शर्मा ने तैयार किया है, जबकि गीत कुमार विश्वास ने लिखे हैं। हालांकि संगीत कहानी को यादगार बनाने में ज्यादा मदद नहीं कर पाता। कई जगह बैकग्राउंड स्कोर जरूरत से ज्यादा तेज महसूस होता है, जिससे दृश्य का असर कम हो जाता है। गाने भी फिल्म खत्म होने के बाद लंबे समय तक याद नहीं रहते।
किन दर्शकों को पसंद आ सकती है फिल्म
‘आखिरी सवाल’ पूरी तरह मनोरंजन प्रधान फिल्म नहीं है। यह उन दर्शकों को ज्यादा आकर्षित कर सकती है जिनकी रुचि राजनीति, इतिहास और वैचारिक बहसों में है। आम मसाला फिल्मों जैसी गति और मनोरंजन की उम्मीद करने वाले दर्शकों को यह फिल्म धीमी लग सकती है।
फिल्म कई विवादित विषयों को सामने लाती है और दर्शकों को अलग नजरिए से सोचने का मौका देती है। हालांकि इसकी प्रस्तुति हर स्तर पर प्रभावी नहीं बन पाती। इसके बावजूद गंभीर राजनीतिक विषयों में रुचि रखने वाले लोग इसे एक बार देख सकते हैं।