SupremeCourt – सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में आपराधिक कानून के दुरुपयोग पर जताई चिंता
SupremeCourt – सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में झूठे या दुर्भावनापूर्ण आपराधिक मुकदमों की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत मतभेदों और पारिवारिक विवादों को निपटाने के लिए आपराधिक कानून का गलत इस्तेमाल न्याय व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव डालता है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे मामलों को बढ़ावा देने के बजाय उन्हें रोकने की जिम्मेदारी न्यायपालिका और विधिक समुदाय दोनों की है।

एक साथ कई मामलों को किया निरस्त
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की खंडपीठ ने पति और उसके परिजनों के खिलाफ दर्ज एक दर्जन के करीब आपराधिक मामलों को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। इन मामलों में गंभीर धाराओं के तहत लगाए गए आरोप भी शामिल थे। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि शिकायतों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
वकीलों की भूमिका पर भी अदालत की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि वकीलों को अपने मुवक्किलों को अनावश्यक और कमजोर आधार वाले आपराधिक मुकदमे दर्ज कराने के लिए प्रेरित नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, जहां संभव हो, उन्हें विवादों के शांतिपूर्ण और कानूनी समाधान की दिशा में मार्गदर्शन देना चाहिए।
पुराने फैसले का भी किया उल्लेख
पीठ ने अपने पूर्व के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि परिवार और वैवाहिक संबंध समाज की महत्वपूर्ण इकाई हैं। ऐसे में छोटी-छोटी असहमतियों या मतभेदों को गंभीर आपराधिक मामलों का रूप देना उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने दोहराया कि बार के सदस्यों की सामाजिक जिम्मेदारी भी है कि वे पारिवारिक विवादों को अनावश्यक रूप से जटिल न बनने दें।
लंबे समय से चल रहा था पारिवारिक विवाद
मामला एक दंपति के बीच वर्षों से चले आ रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा था। दोनों का विवाह वर्ष 2008 में हुआ था और उनके दो बच्चे हैं। कुछ वर्षों बाद दोनों अलग रहने लगे। इसके बाद पति-पत्नी और उनके परिवारों के बीच कई दीवानी और आपराधिक मामले दर्ज हुए। इनमें वैवाहिक उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, हत्या के प्रयास और तलाक से जुड़े विवाद शामिल थे।
गंभीर आरोपों की भी हुई जांच
हाल के वर्षों में दर्ज एक शिकायत में पति और उसके परिवार के कुछ सदस्यों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। शिकायत में नाबालिग बच्ची से जुड़े यौन अपराधों का भी उल्लेख किया गया था। मामले की जांच और उपलब्ध दस्तावेजों की समीक्षा के बाद अदालत ने पाया कि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त और ठोस साक्ष्य सामने नहीं आए।
हाईकोर्ट का आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि शिकायत में लगाए गए आरोप स्पष्ट नहीं थे और उपलब्ध चिकित्सीय या अन्य साक्ष्यों से उनका पर्याप्त समर्थन भी नहीं मिलता था। न्यायालय ने यह भी माना कि शिकायत पहले से चल रहे विवादों की पृष्ठभूमि में दर्ज की गई प्रतीत होती है।
गंभीर मामलों में अतिरिक्त सावधानी जरूरी
अपने फैसले में पीठ ने कहा कि यौन अपराधों जैसे संवेदनशील मामलों में अदालतों को अत्यधिक सतर्कता बरतनी चाहिए। वैवाहिक विवादों के दौरान कभी-कभी आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाने या तथ्यों को अलग तरीके से प्रस्तुत किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए प्रत्येक मामले का मूल्यांकन तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
वास्तविक शिकायतों की अहमियत बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणी को वास्तविक पीड़ितों की शिकायतों के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि जहां उत्पीड़न, हिंसा या यौन अपराध के आरोप वास्तविक हों, वहां कानून के तहत सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई आवश्यक है। यह फैसला केवल संबंधित मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर दिया गया है।