Kanyadaan: हिंदू विवाह में कन्यादान बेटी को बोझ नहीं, वस्तु नहीं, नई यात्रा का आशीर्वाद क्यों देते हैं?
Kanyadaan: हमारे समाज में आजकल एक सवाल बार-बार गूंजता है। जब हम नारी को देवी मानकर पूजते हैं, उसे माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती कहते हैं, तो फिर विवाह के समय उसकी “दान” जैसी बात क्यों? बहुत से युवा जोड़े इसे स्त्री के सम्मान के खिलाफ मानते हैं और इसे अपने विवाह से पूरी तरह हटा देते हैं। उनकी सोच है कि बेटी कोई संपत्ति नहीं जिसे एक हाथ से दूसरे हाथ में सौंप दिया जाए। यह बात दिल को छूती भी है। लेकिन क्या हमने कभी गहराई से जाना कि हमारे शास्त्रों में इस संस्कार का असली भाव क्या था? आइए आज बिना किसी पूर्वाग्रह के, सिर्फ समझने की कोशिश करते हैं।

प्राचीन भारत में नारी की गरिमा को याद कीजिए
हम वही सभ्यता हैं जहाँ रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं, “ढोल गंवारा धोबा, सूद्र पशु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।” नहीं-नहीं, यह पंक्ति तो बाद में जोड़ी गई है, मूल में ऐसा कुछ नहीं। वास्तव में ऋग्वेद में 10वीं मंडल के 85वें सूक्त में सूर्य की पुत्री सूर्या के स्वयंवर का वर्णन है। वहाँ सूर्या खुद अपना वर चुनती है। मनुस्मृति में भी लिखा है कि पिता को बेटी का विवाह उसकी सहमति से ही करना चाहिए। जब पौराणिक काल से ही कन्या को चुनने का पूरा अधिकार था, तो क्या उसी संस्कृति में उसे अचानक “वस्तु” मान लिया गया होगा? बिल्कुल नहीं।
“कन्या” और “दान” शब्द का गहरा अर्थ
संस्कृत में कन्या का मतलब सिर्फ अविवाहिता नहीं, बल्कि वह शक्ति भी है जो सृष्टि को चलाती है। वहीं दान का अर्थ है, त्यागपूर्वक किसी को सौंपना, पर स्वामित्व छोड़ना नहीं। जब पिता कहते हैं, “कन्यादानम् करोमि”, तो वे यह घोषणा करते हैं कि अब यह कन्या मेरे गोत्र की नहीं, आपके गोत्र की हो गई। यह गोत्र परिवर्तन का आध्यात्मिक संस्कार है। विज्ञान भी यही कहता है कि बच्चे का वंश पिता के द्वारा आगे बढ़ता है, इसलिए कन्या का गोत्र बदलना एक प्राकृतिक प्रक्रिया को शास्त्रीय मान्यता देता है। यह बेटी को “खोने” की नहीं, उसे नए कुल की लक्ष्मी बनाने की प्रक्रिया है।
क्या वाकई कन्यादान के बिना विवाह अधूरा है?
बिल्कुल नहीं। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अनुसार भी सिर्फ सप्तपदी और मंत्रों से ही विवाह पूर्ण हो जाता है। आर्य समाज हो या केरल के कुछ मातृसत्तात्मक समुदाय, वहाँ कन्यादान की प्रथा ही नहीं है, फिर भी उनका विवाह पूर्ण और पवित्र माना जाता है। गंधर्व विवाह, जिसमें सिर्फ दो प्रेमी एक-दूसरे का हाथ थामकर वचन लेते हैं, वह भी हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाहों में से एक है। यानी हिंदू धर्म इतना लचीला है कि वह आपको अपनी सहूलियत और विश्वास के अनुसार रीति चुनने की पूरी छूट देता है।
जब बदलाव जरूरी लगे तो बदलें, पर जड़ें न भूलें
आज की पीढ़ी को अगर कन्यादान को अपमानजनक मानती है तो उसे हटाने में कोई पाप नहीं। लेकिन सिर्फ इसलिए न हटाएँ क्योंकि किसी ने सोशल मीडिया पर लिख दिया कि यह “स्त्री को वस्तु बनाता है”। पहले जानिए कि हमारे पूर्वजों ने इस संस्कार के पीछे कितना सुंदर भाव रखा था। वे बेटी को बोझ नहीं, दो परिवारों के मिलन का सबसे पवित्र सेतु मानते थे। जब पिता हाथ बढ़ाता है तो वह कह रहा होता है, “आज से यह मेरी नहीं, तुम्हारी अमानत है, इसे उतना ही प्यार दो जितना मैंने दिया।” यह दान नहीं, विश्वास का हस्तांतरण है।
अंत में एक छोटी-सी बात
हम अपनी परंपराओं को या तो आँख मूंदकर मानते हैं या आँख मूंदकर ठुकरा देते हैं। दोनों ही गलत हैं। समझकर अपनाएँ या समझकर त्यागें, यही सच्ची श्रद्धा है। कन्यादान बेटी को छोटा करने का नहीं, उसे दो परिवारों का गहना बनाने का संस्कार है। अगर आपको यह भाव पसंद है तो अपनाएँ, नहीं तो प्यार से नए रीति बना लें। हिंदू धर्म में इतनी जगह है कि दोनों के लिए सम्मान हो।



