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Judiciary – जस्टिस यशवंत वर्मा जांच रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी

Judiciary – जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े मामले में गठित जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी है। लोकसभा सचिवालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार यह रिपोर्ट जल्द ही संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाएगी। माना जा रहा है कि आगामी मानसून सत्र के दौरान इस पर औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। यह मामला पिछले साल सामने आई एक विवादित घटना के बाद चर्चा में आया था।

आग की घटना के बाद शुरू हुआ विवाद

पूरा मामला मार्च 2025 की एक घटना से जुड़ा है। उस समय दिल्ली स्थित सरकारी आवास में आग लगने के बाद मौके पर पहुंचे कर्मचारियों को एक स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी मिली थी। उस दौरान जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश के पद पर कार्यरत थे। बाद में उनका तबादला उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद हाई कोर्ट में कर दिया गया था।

आंतरिक जांच में उठे सवाल

घटना के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की जांच के लिए एक आंतरिक समिति बनाई थी। जांच के दौरान समिति ने यह निष्कर्ष निकाला कि जिस कमरे में नकदी रखी गई थी, उस पर न्यायमूर्ति वर्मा का मौन नियंत्रण माना जा सकता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर संसद में उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग तेज हुई थी।

सांसदों ने हटाने का प्रस्ताव दिया

जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा को पद से हटाने के प्रस्ताव का समर्थन किया था। भारतीय कानून के अनुसार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के किसी भी न्यायाधीश को केवल संसद की प्रक्रिया के माध्यम से ही हटाया जा सकता है। इसी प्रक्रिया के तहत लोकसभा अध्यक्ष ने अगस्त 2025 में तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था।

इस्तीफे के बाद बदली स्थिति

जांच और संभावित कार्रवाई के बीच जस्टिस यशवंत वर्मा ने हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस्तीफे के बाद संसद द्वारा उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया का महत्व काफी हद तक कम हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के अनुसार, जब कोई न्यायाधीश राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंप देता है और वह सार्वजनिक हो जाता है, तो उसे प्रभावी माना जाता है।

कानूनी स्थिति पर बनी चर्चा

हालांकि आधिकारिक रिकॉर्ड में उनका नाम अभी भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की सूची में दिखाई दे रहा है, लेकिन कानूनी दृष्टि से उन्हें अब पदमुक्त माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि संसद किसी पूर्व न्यायाधीश को पद से नहीं हटा सकती। जस्टिस वर्मा का कार्यकाल वर्ष 2031 तक निर्धारित था।

संसद के अगले कदम पर नजर

जांच समिति ने अपना कार्य उस समय शुरू किया था जब जस्टिस वर्मा पद पर थे, इसलिए उनके इस्तीफे से समिति की प्रक्रिया प्रभावित नहीं हुई। अब सभी की नजर संसद की आगामी कार्यवाही पर है। रिपोर्ट सदनों में पेश होने के बाद आगे की संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया पर निर्णय लिया जाएगा।

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