JuvenileJustice – हत्या के मामलों में नाबालिग पर वयस्क की तरह चल सकता है मुकदमा
JuvenileJustice– सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किशोर न्याय कानून में निर्धारित सभी कानूनी शर्तें पूरी होती हैं, तो हत्या जैसे गंभीर अपराध के आरोपित 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग के नाबालिग पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि हत्या का अपराध किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है, इसलिए ऐसे मामलों में कानून के अनुरूप वयस्क के रूप में ट्रायल का रास्ता खुला रहता है।

पटना हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी बिहार के एक हत्या मामले से जुड़ी अपील पर सुनवाई करते हुए की। यह अपील पटना हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें एक 16 वर्षीय आरोपी पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी।
हत्या को माना जघन्य अपराध
सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या के अपराध में आजीवन कारावास या मृत्युदंड का प्रावधान है। न्यायालय के अनुसार, आजीवन कारावास इस अपराध के लिए न्यूनतम दंड माना जाएगा, क्योंकि अदालत इससे कम सजा नहीं दे सकती। इसी आधार पर हत्या को किशोर न्याय अधिनियम के तहत जघन्य अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा।
बचाव पक्ष ने रखा था अलग तर्क
सुनवाई के दौरान नाबालिग की ओर से दलील दी गई कि धारा 302 में “कम से कम” सात वर्ष की सजा जैसे शब्दों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इसलिए हत्या को जघन्य अपराध के बजाय गंभीर अपराध माना जाना चाहिए। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि कानून की व्याख्या केवल शब्दों तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि दंड के वास्तविक स्वरूप को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
किशोर न्याय बोर्ड के फैसले में हुआ था बदलाव
मामले में शुरुआत में किशोर न्याय बोर्ड ने आरोपी का ट्रायल नाबालिग के रूप में चलाने का निर्णय लिया था। बाद में अपीलीय सत्र अदालत ने इस फैसले को पलटते हुए मामला नियमित अदालत में भेजने का निर्देश दिया। इसके बाद पटना हाईकोर्ट ने भी इस आदेश को सही ठहराया। अंततः यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने भी हाईकोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा।
विशेषज्ञों की राय पर भी अदालत ने दी स्पष्टता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 101(2) के तहत अपीलीय अदालत के लिए हर मामले में मनोवैज्ञानिक या चिकित्सा विशेषज्ञ की नई राय लेना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में प्रयुक्त “सकता है” शब्द अदालत को विवेकाधिकार देता है। इसलिए विशेषज्ञों की सहायता केवल उन्हीं मामलों में ली जानी चाहिए, जहां परिस्थितियां इसकी आवश्यकता बताती हों।
फैसले से कानूनी स्थिति हुई स्पष्ट
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय किशोर न्याय अधिनियम के तहत हत्या जैसे गंभीर मामलों में ट्रायल की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जघन्य अपराधों से जुड़े मामलों में प्रत्येक मामले के तथ्यों और कानून के अनुरूप निर्णय लिया जाएगा और आवश्यक शर्तें पूरी होने पर नाबालिग आरोपी पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जा सकता है।