DowryLaw – पैतृक संपत्ति पर दबाव बनाना भी दहेज मांग माना जा सकता: हाईकोर्ट
DowryLaw- कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी विवाहित महिला का अपनी पैतृक संपत्ति में कानूनी अधिकार अलग विषय है, लेकिन यदि पति या उसके परिवार के दबाव में महिला अपने हिस्से की मांग करती है, तो ऐसी स्थिति दहेज की मांग की श्रेणी में आ सकती है। यह टिप्पणी अदालत ने एक दहेज मृत्यु से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें पति की सजा के खिलाफ दायर अपील पर आंशिक राहत दी गई।

अदालत ने अधिकार और दबाव के बीच बताया अंतर
न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी और न्यायमूर्ति अपूर्बा सिन्हा राय की खंडपीठ ने 2 जुलाई को दिए अपने फैसले में कहा कि कानून किसी महिला को पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने का पूरा अधिकार देता है। हालांकि, यदि पति उस पर अपने मायके से संपत्ति या धन लाने के लिए लगातार दबाव बनाता है, तो इसे दहेज की मांग के रूप में देखा जा सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन आवश्यक होता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 2014 का है, जब विवाह के लगभग चार वर्ष बाद एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी अपने वैवाहिक घर में मृत मिली थीं। निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना था कि महिला ने आत्महत्या की थी और उससे पहले अपनी बेटी की भी जान ले ली थी। अदालत ने पति तथा उसके माता-पिता को दहेज उत्पीड़न और दहेज मृत्यु के आरोप में दोषी ठहराया था। पति को आजीवन कारावास और सास-ससुर को सात वर्ष की सजा सुनाई गई थी।
पति की दलील पर अदालत का दृष्टिकोण
अपील के दौरान पति ने कहा कि उसने कभी दहेज की मांग नहीं की और उसकी पत्नी केवल अपने पैतृक संपत्ति में वैध हिस्से की मांग कर रही थी। लेकिन उच्च न्यायालय ने रिकॉर्ड में मौजूद साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा कि महिला के भाई ने पहले ही पारिवारिक संपत्ति का एक हिस्सा बेचकर उसे उसका हिस्सा दे दिया था। इसके बावजूद पति की ओर से शेष संपत्ति बेचने और उससे मिलने वाली राशि भी लाने का दबाव बनाए जाने के संकेत मिले, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया।
गवाहों और एफआईआर पर भी हुई टिप्पणी
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दहेज से जुड़े अधिकांश विवाद घर की चारदीवारी के भीतर होते हैं। इसलिए स्वतंत्र प्रत्यक्ष गवाहों का अभाव अपने आप में अभियोजन पक्ष को कमजोर नहीं करता। वहीं, एफआईआर दर्ज होने में दो दिन की देरी को लेकर उठाई गई आपत्ति भी न्यायालय ने स्वीकार नहीं की। अदालत ने कहा कि किसी परिवार में अचानक हुई ऐसी दुखद घटना के बाद परिजन मानसिक रूप से विचलित हो सकते हैं और कानूनी सलाह लेने के बाद शिकायत दर्ज करना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।
सजा में संशोधन, सास-ससुर को राहत
उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान पाया कि सास-ससुर की संलिप्तता को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं थे। शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों ने भी उनके खिलाफ कोई स्पष्ट भूमिका नहीं बताई। इस आधार पर अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि, पति की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया। न्यायालय ने यह भी कहा कि दहेज मृत्यु के मामलों में आजीवन कारावास जैसी सजा केवल अत्यंत दुर्लभ परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए।