स्वास्थ्य

Lockdown – महामारी के दौरान जन्मे बच्चों पर हुए नए अध्ययन ने जताई चिंता

Lockdown- कोविड-19 महामारी का सबसे कठिन दौर भले ही पीछे छूट चुका हो, लेकिन उससे जुड़े प्रभावों पर वैज्ञानिकों का शोध अब भी जारी है। हाल में प्रकाशित एक अध्ययन में संकेत मिले हैं कि महामारी और लॉकडाउन के दौरान जन्मे कुछ बच्चों के मानसिक और व्यवहारिक विकास पर असर देखने को मिल सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ऐसे बच्चों में ध्यान केंद्रित करने, भावनाओं को नियंत्रित करने और निर्देशों का पालन करने जैसी क्षमताओं में अपेक्षाकृत अधिक कठिनाइयां दर्ज की गई हैं। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस विषय पर अभी और व्यापक शोध की जरूरत है।

शुरुआती माहौल का विकास पर पड़ता है प्रभाव

विशेषज्ञों का कहना है कि जीवन के शुरुआती वर्षों में बच्चे अपने आसपास के वातावरण से सबसे अधिक सीखते हैं। इस दौरान परिवार के अलावा अन्य बच्चे, शिक्षक, रिश्तेदार और सामाजिक संपर्क भी उनके मानसिक एवं सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन लॉकडाउन के समय जन्मे कई बच्चों का शुरुआती बचपन घर तक ही सीमित रहा। ऐसे में उन्हें सामान्य सामाजिक अनुभव अपेक्षाकृत कम मिले, जिसका असर उनके विकास पर पड़ने की संभावना को लेकर शोधकर्ताओं ने चिंता जताई है।

अध्ययन में किन बच्चों को किया गया शामिल

इंग्लैंड की सिटी सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के शोधकर्ताओं ने 23 मार्च से 23 जून 2020 के बीच पहले राष्ट्रीय लॉकडाउन के दौरान जन्मे 205 बच्चों का अध्ययन किया। यह शोध जर्नल आर्काइव्स ऑफ डिजीज इन चाइल्डहुड में प्रकाशित हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, अब जब ये बच्चे लगभग चार वर्ष की आयु के हो चुके हैं, तब उनके संज्ञानात्मक और व्यवहारिक विकास का मूल्यांकन किया गया। शोधकर्ताओं ने बताया कि यह इस आयु वर्ग के लॉकडाउन में जन्मे बच्चों पर किए गए शुरुआती प्रमुख अध्ययनों में से एक है।

किन क्षमताओं में आई कमी के संकेत

शोध के दौरान बच्चों की भाषा क्षमता, नॉन-वर्बल रीजनिंग और एक्जीक्यूटिव फंक्शन का आकलन किया गया। एक्जीक्यूटिव फंक्शन वह मानसिक क्षमता है, जिसकी मदद से व्यक्ति योजना बनाता है, समस्याओं का समाधान खोजता है, ध्यान बनाए रखता है और बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालता है। अध्ययन में शामिल लगभग हर तीन में से एक बच्चे में इन क्षमताओं से जुड़ी चुनौतियां सामने आईं। साथ ही कई बच्चों में विचारों और भावनाओं को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने की क्षमता भी अपेक्षा से कम पाई गई।

परिवारों से भी जुटाई गई विस्तृत जानकारी

अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने बच्चों के माता-पिता से भी विस्तृत जानकारी ली। इसमें बच्चों की याददाश्त, व्यवहार, भावनाओं पर नियंत्रण, समस्या हल करने की क्षमता, दैनिक गतिविधियों और भाषा विकास से जुड़े सवाल शामिल थे। विशेषज्ञों का मानना है कि लॉकडाउन के दौरान माता-पिता के साथ अधिक समय बिताने के कारण बच्चों की दूसरों की बात समझने की क्षमता अपेक्षाकृत बेहतर हो सकती है। वहीं परिवार के बाहर सीमित सामाजिक संपर्क के कारण बोलकर अपनी बात व्यक्त करने के अवसर कम मिले, जिसका प्रभाव भाषा विकास पर पड़ सकता है।

शोधकर्ताओं ने सावधानी के साथ समझने की दी सलाह

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह एक ऑब्जर्वेशनल स्टडी है, इसलिए इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बच्चों में देखे गए सभी बदलावों का कारण केवल लॉकडाउन ही है। अध्ययन में लॉकडाउन से पहले जन्मे समान आयु वर्ग के बच्चों की तुलना भी शामिल नहीं थी। शोधकर्ताओं का कहना है कि परिणामों को बेहतर ढंग से समझने के लिए बड़े और दीर्घकालिक अध्ययनों की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि स्कूलों और परिवारों को ऐसे बच्चों के सीखने और व्यवहार संबंधी विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर समय रहते उचित सहयोग उपलब्ध कराया जा सके।

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