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Census – जाति आधारित जनगणना के दूसरे चरण की तैयारी, अधिक व्यवस्थित होगी प्रश्नावली

Census – आगामी जनगणना के दूसरे चरण में प्रस्तावित जाति आधारित गणना को अधिक सटीक और व्यवस्थित बनाने के लिए तैयारियां तेज कर दी गई हैं। अधिकारियों के स्तर पर ऐसी प्रश्नावली तैयार की जा रही है, जिससे जाति संबंधी जानकारी स्पष्ट रूप से दर्ज हो सके और आंकड़ों की विश्वसनीयता बनी रहे। इसके साथ ही, जनगणनाकर्मियों को प्राप्त होने वाली सूचनाओं के सत्यापन के लिए भी उपयुक्त प्रक्रिया विकसित करने पर काम चल रहा है।

सितंबर से शुरू होगा कुछ क्षेत्रों में दूसरा चरण

आधिकारिक तैयारियों के अनुसार, लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बर्फीले इलाकों में जनगणना का अगला चरण इसी वर्ष सितंबर से शुरू किया जाएगा। इससे पहले अगस्त में दूसरे चरण की प्रश्नावली जारी किए जाने की संभावना है। इस चरण में 1 मार्च 2027 को संदर्भ तिथि मानते हुए प्रत्येक व्यक्ति से जनसंख्या, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, प्रवास और अन्य आवश्यक जानकारियां एकत्र की जाएंगी, जिनमें जाति संबंधी विवरण भी शामिल रहेगा।

प्रश्नावली को अंतिम रूप देने से पहले हो रहा अभ्यास

भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय ने दूसरे चरण की शुरुआत से पहले जनगणना प्रगणकों के लिए पूर्वाभ्यास शुरू किया है। इस अभ्यास के दौरान यह सामने आया है कि कई लोग अपनी जाति अलग-अलग नामों या स्थानीय पहचान के आधार पर बताते हैं। इससे एक ही समुदाय के लिए कई प्रकार के नाम दर्ज होने की संभावना बनती है। इसी कारण प्रश्नावली और डेटा संग्रह की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और मानकीकृत बनाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

वर्गीकरण सबसे बड़ी चुनौती

अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती जातियों और उपजातियों के सही वर्गीकरण की है। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में एक ही समुदाय के लिए अलग नाम प्रचलित होने के कारण आंकड़ों को एक समान श्रेणी में व्यवस्थित करना आसान नहीं माना जा रहा। इसलिए जनगणनाकर्मियों को निर्देश दिए जा रहे हैं कि वे दर्ज की जाने वाली जानकारी की वर्तनी और पहचान को सावधानीपूर्वक रिकॉर्ड करें, ताकि बाद में डेटा विश्लेषण में किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति न बने।

पहले के अनुभवों से ली जा रही सीख

ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1931 की जातिगत जनगणना में लगभग 4,147 जातियों का उल्लेख दर्ज किया गया था। वहीं, 2011 में सामाजिक-आर्थिक एवं जाति सर्वेक्षण के दौरान बड़ी संख्या में अलग-अलग नाम दर्ज होने से जातियों और उपजातियों की संख्या लाखों में पहुंच गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति का एक कारण यह भी था कि लोगों ने जाति के साथ गोत्र, उपजाति और स्थानीय पहचान भी अलग-अलग दर्ज कराई थी। इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस बार अधिक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाने की तैयारी की जा रही है।

विशेष परिस्थितियों के लिए भी बन रही व्यवस्था

अधिकारियों के अनुसार, अनाथ, बेसहारा या ऐसे लोगों के मामलों में, जिन्हें अपनी जाति की जानकारी उपलब्ध नहीं है, डेटा संग्रह के दौरान विशेष सावधानी बरती जाएगी। साथ ही, एक जैसी ध्वनि वाले जाति नामों को दर्ज करते समय उनकी सही पहचान सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है। उद्देश्य यह है कि अंतिम आंकड़े यथासंभव सटीक, प्रमाणिक और विश्लेषण के लिए उपयोगी हों, जिससे भविष्य में नीति निर्माण के लिए विश्वसनीय आधार उपलब्ध कराया जा सके।

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