IkkaReview – दमदार कलाकारों के बावजूद कोर्टरूम ड्रामा नहीं छोड़ पाता गहरी छाप
IkkaReview- सनी देओल और अक्षय खन्ना अभिनीत फिल्म ‘इक्का’ अपने ट्रेलर की वजह से रिलीज से पहले काफी चर्चा में रही थी। दोनों अनुभवी कलाकारों को आमने-सामने देखने की उत्सुकता दर्शकों में साफ दिखाई दी। हालांकि फिल्म देखने के बाद यह एहसास होता है कि ट्रेलर जितनी उम्मीदें जगाता है, कहानी उन्हें पूरी तरह पूरा नहीं कर पाती। फिल्म कोर्टरूम ड्रामा के रूप में आगे बढ़ती है, लेकिन थ्रिलर के स्तर पर अपेक्षित प्रभाव छोड़ने में कमजोर नजर आती है।

कहानी में रहस्य से ज्यादा भावनात्मक घटनाक्रम
फिल्म की शुरुआत सोमा मित्तल की हत्या से होती है, जिसका आरोप उद्योगपति शौर्यमान गौर पर लगता है। अपने बचाव के लिए वह वरिष्ठ वकील अर्जुन मेहरा से संपर्क करता है, जो अब तक कोई मुकदमा नहीं हारे हैं। शुरुआत में अर्जुन इस केस को लेने से इनकार कर देते हैं, लेकिन उनकी बेटी की गंभीर बीमारी के बीच परिस्थितियां बदल जाती हैं। शौर्यमान इलाज में मदद की पेशकश करता है और बदले में चाहता है कि अर्जुन उसका केस लड़ें। इसके बाद फिल्म नैतिक दुविधा, पारिवारिक जिम्मेदारियों और अदालत की कार्यवाही के बीच आगे बढ़ती है।
अभिनय में कलाकारों की क्षमता पूरी तरह सामने नहीं आई
सनी देओल इस फिल्म में अपने पारंपरिक आक्रामक अंदाज से अलग संयमित भूमिका में दिखाई देते हैं। हालांकि कई भावनात्मक दृश्यों में उनका प्रदर्शन अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ता। कोर्टरूम के कुछ दृश्य जरूर उनकी मौजूदगी को मजबूत बनाते हैं, लेकिन पूरी फिल्म में ऐसे पल सीमित हैं।
अक्षय खन्ना का किरदार भी प्रभावशाली बनने की क्षमता रखता था, लेकिन पटकथा उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं देती। उनके अभिनय में गंभीरता तो दिखाई देती है, फिर भी चरित्र उतनी गहराई हासिल नहीं कर पाता जितनी उनसे उम्मीद की जाती है। दीया मिर्जा, तिलोत्तमा शोम, संजीदा शेख और आकांक्षा रंजन कपूर अपनी-अपनी भूमिकाओं में नजर आती हैं, लेकिन अधिकांश सहायक पात्रों को सीमित स्क्रीन स्पेस मिला है। जज की भूमिका में विजय विक्रम सिंह अपेक्षाकृत अलग छाप छोड़ते हैं।
निर्देशन में संतुलन की कमी महसूस होती है
निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने फिल्म को भावनात्मक पहलुओं के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की है, लेकिन इसी प्रक्रिया में कोर्टरूम थ्रिलर का तनाव कई जगह कमजोर पड़ जाता है। शुरुआती हिस्से में भावनात्मक दृश्यों की संख्या अधिक होने से कहानी की गति प्रभावित होती है। अदालत से जुड़े कुछ दृश्य रोचक हैं, लेकिन वे पूरे कथानक को मजबूती देने के लिए पर्याप्त नहीं लगते। यदि कहानी में कानूनी टकराव और रहस्य को अधिक जगह दी जाती, तो फिल्म का प्रभाव अलग हो सकता था।
तकनीकी पक्ष और प्रस्तुति
फिल्म का निर्माण स्तर संतोषजनक है, लेकिन पटकथा और संपादन इसे अधिक प्रभावशाली बना सकते थे। कई दृश्य लंबे महसूस होते हैं और कहानी का खुलासा भी धीरे-धीरे होने के बजाय अंत में एक साथ सामने आता है। संगीत भी यादगार असर नहीं छोड़ता और फिल्म की गति को विशेष सहयोग नहीं दे पाता।
देखें या नहीं
यदि आप सनी देओल और अक्षय खन्ना के प्रशंसक हैं या कोर्टरूम आधारित फिल्मों में रुचि रखते हैं, तो यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है। हालांकि जो दर्शक तेज रफ्तार थ्रिलर और लगातार सस्पेंस की उम्मीद लेकर फिल्म देखेंगे, उन्हें यह अपेक्षाकृत अधिक भावनात्मक और धीमी लग सकती है। इसलिए इसे कोर्टरूम ड्रामा के रूप में देखना बेहतर रहेगा, न कि पूरी तरह थ्रिलर फिल्म के तौर पर।