BhabijiReview – बड़े पर्दे पर पहुँची टीवी कॉमेडी, लेकिन सिनेमा की कसौटी पर कमजोर…
BhabijiReview – टीवी के सुपरहिट सिटकॉम ‘भाबीजी घर पर हैं’ की दुनिया को बड़े पर्दे तक ले जाने की कोशिश फिल्म ‘भाबीजी घर पर हैं: फन ऑन द रन’ में की गई है। फिल्म पड़ोसियों की नोंक-झोंक, गलतफहमियों और हल्की-फुल्की कॉमेडी के उसी फॉर्मूले पर चलती है, जिसने टीवी पर इसे सालों तक लोकप्रिय बनाए रखा। हालांकि, यह सिनेमाई प्रयोग दर्शकों को नॉस्टेल्जिया तो देता है, लेकिन फिल्म के रूप में अपनी पकड़ पूरी तरह मजबूत नहीं कर पाता।

टीवी से सिनेमा तक की यात्रा
फिल्म का माहौल बिल्कुल वैसा ही रखा गया है जैसा दर्शकों ने टीवी पर देखा है। वही परिचित चेहरे, वही भाषा और वही शरारती टोन बड़े पर्दे पर भी नजर आती है। निर्देशक शशांक बाली ने टीवी शो की पहचान को जस का तस बनाए रखने की कोशिश की है, लेकिन यही बात फिल्म के लिए कमजोरी बन जाती है। टीवी एपिसोड वाली रफ्तार और ढीलापन फिल्मी ढांचे में फिट नहीं बैठ पाता।
कहानी में सफर, भ्रम और ट्विस्ट
कहानी विभूति मिश्रा और मनमोहन तिवारी के परिवारों की एक रोड ट्रिप से शुरू होती है। शुरुआत साधारण लगती है, लेकिन सफर आगे बढ़ते ही इसमें गलतफहमियों, भागदौड़ और अजीब परिस्थितियों की भरमार हो जाती है। बीच में गैंगस्टर ट्रैक और हल्का हॉरर एंगल भी जोड़ा गया है, जो कहानी को अलग मोड़ देने की कोशिश करता है। अंगूरी भाभी से जुड़ा रहस्यमय पहलू अचानक रोमांच पैदा करता है, जबकि विभूति और तिवारी की आपसी तकरार हास्य का मुख्य आधार बनी रहती है। हालांकि, कहानी कई दिशाओं में भटकती नजर आती है और यही बिखराव फिल्म की गति को प्रभावित करता है।
अभिनय बना फिल्म की सबसे बड़ी ताकत
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष कलाकारों का अभिनय है। आशिफ शेख, रोहिताश गौर, शुभांगी अत्रे और विदिशा श्रीवास्तव अपने-अपने किरदारों में पूरी तरह सहज नजर आते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग वही पुरानी है, जिसे दर्शक पहले से पसंद करते आए हैं।
सपोर्टिंग किरदारों की वापसी भी फिल्म में जान डालती है। सानंद वर्मा का सक्सेना और योगेश त्रिपाठी का दारोगा हप्पू सिंह दर्शकों को हंसाने में सफल रहते हैं। सोमा राठौड़ का ओवर-द-टॉप घरेलू हास्य भी शो की याद दिलाता है।
फिल्मी कलाकारों में मुकेश तिवारी, निरहुआ और रवि किशन अपने-अपने अंदाज में कहानी को आगे बढ़ाते हैं। बृजेंद्र काला की सधी हुई कॉमेडी कुछ दृश्यों को संतुलन देती है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
निर्देशन के स्तर पर फिल्म साफ तौर पर टीवी स्टाइल से बाहर नहीं निकल पाती। शशांक बाली का अनुभव छोटे पर्दे पर असरदार रहा है, लेकिन फिल्म में वही शैली लंबाई और कसावट की कमी के साथ सामने आती है। एडिटिंग कई जगह ढीली महसूस होती है और कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा खिंचे हुए लगते हैं।
हॉरर, गैंगस्टर और कॉमेडी का मिश्रण नया प्रयोग तो है, लेकिन यह संतुलन पूरी तरह बन नहीं पाता। विजुअल्स सीमित पैमाने के हैं, जो बड़े पर्दे का प्रभाव कम कर देते हैं।
दर्शकों के लिए क्या है फैसला
जो दर्शक ‘भाबीजी घर पर हैं’ के लंबे समय से फैन हैं, उनके लिए यह फिल्म एक बार देखने लायक हो सकती है। उन्हें अपने पसंदीदा किरदार उसी अंदाज में मिल जाते हैं। लेकिन जो दर्शक एक मजबूत कहानी, टाइट स्क्रीनप्ले और पूरी तरह सिनेमाई अनुभव की उम्मीद लेकर जाएंगे, उन्हें यह फिल्म औसत लग सकती है। मनोरंजन के कुछ पल जरूर हैं, मगर कुल मिलाकर फिल्म टीवी शो की छाया से बाहर निकलने में नाकाम रहती है।