FuelPrices – बढ़ती तेल लागत से सरकार और कंपनियों पर बढ़ा दबाव
FuelPrices – देश में कमर्शियल गैस सिलिंडर की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी के बाद अब पेट्रोल, डीजल और घरेलू एलपीजी को लेकर भी आर्थिक दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। फिलहाल आम उपभोक्ताओं को राहत देते हुए घरेलू रसोई गैस और ईंधन की खुदरा कीमतों में बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने सरकार और तेल कंपनियों दोनों की चिंता बढ़ा दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल कीमतों को नियंत्रित रखा गया है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना आसान नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार और घरेलू बिक्री दरों के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है, जिससे तेल कंपनियों पर वित्तीय बोझ तेजी से बढ़ रहा है।
कच्चे तेल की महंगाई से बढ़ा संकट
रेटिंग एजेंसी इक्रा की रिपोर्ट के मुताबिक, यदि कच्चे तेल की कीमत 120 से 125 डॉलर प्रति बैरल के बीच बनी रहती है, तो पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर तेल कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि पेट्रोल पर कंपनियों का मार्जिन लगभग 14 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर करीब 18 रुपये प्रति लीटर तक नकारात्मक हो सकता है।
घरेलू एलपीजी पर भी दबाव बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि मौजूदा स्थिति जारी रहती है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में घरेलू गैस सिलिंडर पर तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी 80 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
बजट प्रावधान से कई गुना अधिक बोझ
सरकार ने मौजूदा बजट में एलपीजी सब्सिडी के लिए लगभग 11 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसमें गरीब परिवारों के लिए उज्ज्वला योजना और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाएं शामिल हैं। हालांकि, अनुमानित अंडर-रिकवरी इस राशि से कई गुना अधिक बताई जा रही है।
आर्थिक जानकारों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो सरकार को अतिरिक्त वित्तीय सहायता देनी पड़ सकती है।
पहले भी कंपनियों को मिली थी राहत
यह पहली बार नहीं है जब तेल कंपनियों को नुकसान की भरपाई के लिए सरकारी सहायता की जरूरत पड़ी हो। अगस्त 2025 में केंद्र सरकार ने इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम को घरेलू एलपीजी पर हुए नुकसान की भरपाई के लिए 30 हजार करोड़ रुपये की राहत मंजूर की थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ते दबाव के कारण भविष्य में भी इसी तरह के कदम उठाने पड़ सकते हैं।
उर्वरक सब्सिडी पर भी असर
ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर सिर्फ तेल कंपनियों तक सीमित नहीं है। इक्रा ने अनुमान लगाया है कि वर्ष 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी का खर्च 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच सकता है, जबकि बजट में इसके लिए कम राशि निर्धारित की गई है।
इसका मतलब है कि महंगी ऊर्जा का असर सरकारी खर्च, कंपनियों की कमाई और आम लोगों के मासिक बजट तीनों पर पड़ रहा है।
सरकार के सामने तीन विकल्प
सरकारी सूत्रों के अनुसार, आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव से इनकार नहीं किया जा सकता। अप्रैल 2022 से खुदरा कीमतों में कोई बड़ा संशोधन नहीं हुआ है, जबकि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊपर बनी हुई हैं।
फिलहाल सरकार के सामने तीन विकल्प बताए जा रहे हैं। पहला, तेल कंपनियों को नुकसान सहने दिया जाए। दूसरा, सरकारी बजट से अतिरिक्त सहायता दी जाए। तीसरा, धीरे-धीरे खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी की जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन तीनों विकल्पों का सीधा असर या तो सरकारी खजाने, तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति या आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा।