Defence Procurement – रक्षा खरीद में देरी से सैन्य तैयारियों पर बढ़ी चिंता
Defence Procurement के मोर्चे पर भारत के सामने आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ-साथ समय पर सैन्य उपकरण हासिल करने की चुनौती भी बनी हुई है। संसद की हालिया समितियों की रिपोर्टों में रक्षा सौदों और हथियारों की आपूर्ति में होने वाली देरी पर चिंता जताई गई है। सरकार ने स्वदेशी खरीद को बढ़ावा देने और रक्षा अनुबंधों की गति तेज करने पर जोर दिया है, लेकिन किसी प्रणाली की जरूरत से लेकर उसके वास्तविक रूप से सेना तक पहुंचने का समय अब अहम सवाल बन गया है।

तोपों की खरीद में वर्षों की देरी
संसद की लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में स्वदेशी धनुष तोप परियोजना का उदाहरण देते हुए रक्षा उत्पादन में देरी का मुद्दा उठाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, बुनियादी ढांचे और तकनीकी विशेषज्ञता से जुड़ी कमियों के कारण परियोजना तय समयसीमा से पीछे रही। समस्या केवल इंतजार तक सीमित नहीं है। लंबे अंतराल के बाद जब कोई हथियार सेना में शामिल होता है, तब तक उसके विकास के समय उपलब्ध तकनीक में काफी बदलाव आ चुका हो सकता है।
समितियों ने तय समयसीमा पर दिया जोर
संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति ने भी बदलते सुरक्षा माहौल को देखते हुए रक्षा खरीद के लिए स्पष्ट और सख्त समयसीमा की जरूरत बताई है। समिति के मुताबिक, हाइब्रिड युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई पीढ़ी की सैन्य तकनीक तेजी से बदल रही है। ऐसे में खरीद प्रक्रिया लंबी खिंचने पर अत्याधुनिक प्रणाली भी सेना में शामिल होने से पहले ही अपेक्षाकृत पुरानी पड़ सकती है। इसका सीधा असर सैन्य तैयारियों पर पड़ने की आशंका रहती है।
लड़ाकू विमानों की कमी बड़ी चुनौती
वायुसेना के आधुनिकीकरण में भी यही समस्या दिखाई देती है। वायुसेना को 42 लड़ाकू स्क्वॉड्रन की जरूरत बताई जाती रही है, जबकि पुराने विमानों के हटने और नए विमानों की धीमी आपूर्ति के बीच मौजूदा संख्या करीब 29 स्क्वॉड्रन रह गई है। भारत के पास 36 राफेल विमान हैं, जबकि 114 अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद का प्रस्ताव अभी अनुबंध के स्तर तक नहीं पहुंचा है। फ्रांस की ओर से तकनीकी और वाणिज्यिक प्रस्ताव दिए जाने के बाद भी बातचीत और भारत में उत्पादन क्षमता तैयार करने में समय लग सकता है।
तेजस और एमका से जुड़ी उम्मीदें
स्वदेशी तेजस मार्क 1ए कार्यक्रम से भी समय पर आपूर्ति की उम्मीद पूरी नहीं हो सकी है। 83 विमानों के शुरुआती आदेश और 97 अतिरिक्त विमानों की योजना के बावजूद आपूर्ति में देरी हुई है। इंजन उपलब्धता समेत कई तकनीकी कारणों का असर कार्यक्रम पर पड़ा। दूसरी ओर, पांचवीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी एमका का पहला प्रोटोटाइप इस दशक के अंत तक सामने आने की उम्मीद है। इसके बाद परीक्षण और प्रमाणन की प्रक्रिया होगी, इसलिए इसके वायुसेना में शामिल होने में अभी कई वर्ष लग सकते हैं।
चीन की बढ़ती क्षमता के बीच समय अहम
क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति भी रक्षा खरीद में तेजी की जरूरत को रेखांकित करती है। चीन की वायुसेना के पास जे-20 जैसे स्टील्थ लड़ाकू विमानों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि पाकिस्तान के जे-35ए हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ने की खबरें सामने आई हैं। ऐसे माहौल में भारतीय वायुसेना के लिए वर्तमान लड़ाकू क्षमता को बनाए रखना और भविष्य की तकनीक समय पर हासिल करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
समय पर तकनीक पहुंचाने पर जोर
वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह रक्षा क्षेत्र में समय की अहमियत पर कई बार जोर दे चुके हैं। उनका कहना रहा है कि युद्ध के बदलते स्वरूप में ऐसी तकनीक का सीमित लाभ है जो जरूरत के समय उपलब्ध ही न हो। पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने भी रक्षा उद्योगों से अनुबंध के मुताबिक समय पर सैन्य प्रणालियों की आपूर्ति करने की अपेक्षा जताई थी। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य तभी प्रभावी होगा, जब विकास, उत्पादन और आपूर्ति—तीनों चरण तय जरूरत और समय के अनुरूप आगे बढ़ें।