स्वास्थ्य

PostpartumDepression – प्रसव के बाद दिखें ये संकेत तो मानसिक स्वास्थ्य पर तुरंत दें ध्यान

PostpartumDepression- बच्चे के जन्म के बाद परिवार में खुशियों का माहौल होता है, लेकिन मां के लिए यह समय शारीरिक बदलावों के साथ-साथ मानसिक चुनौतियां भी लेकर आ सकता है। प्रसव के बाद हार्मोन में होने वाले परिवर्तन, पर्याप्त नींद न मिलना, लगातार थकान और नवजात की देखभाल की जिम्मेदारी कई महिलाओं के भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। शुरुआती दिनों में मन का अस्थिर होना सामान्य माना जाता है, लेकिन यदि उदासी या चिंता लंबे समय तक बनी रहे और दैनिक जीवन प्रभावित होने लगे तो इसे गंभीरता से लेना जरूरी है।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन क्या होता है?

पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक मानसिक स्वास्थ्य संबंधी स्थिति है, जो प्रसव के बाद कुछ महिलाओं में विकसित हो सकती है। इसे सामान्य “बेबी ब्लूज” से अलग माना जाता है। जहां बेबी ब्लूज के लक्षण कुछ दिनों में अपने आप कम हो जाते हैं, वहीं पोस्टपार्टम डिप्रेशन कई सप्ताह या महीनों तक बना रह सकता है। समय पर पहचान और विशेषज्ञ की सलाह मिलने पर इसका प्रभावी उपचार संभव है।

किन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए?

यदि नई मां लगातार उदास महसूस करे, बिना स्पष्ट कारण के बार-बार रोने लगे या पहले जिन गतिविधियों में खुशी मिलती थी उनमें भी रुचि खत्म होने लगे, तो यह चिंता का विषय हो सकता है। लगातार बेचैनी, घबराहट, भविष्य को लेकर डर या हर समय तनाव में रहना भी महत्वपूर्ण संकेत माने जाते हैं। ऐसे लक्षण यदि लंबे समय तक बने रहें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित होता है।

नींद, भूख और भावनात्मक जुड़ाव में बदलाव

पोस्टपार्टम डिप्रेशन का असर केवल मनोदशा तक सीमित नहीं रहता। कई महिलाओं की नींद का पैटर्न पूरी तरह बदल जाता है। किसी को जरूरत से अधिक नींद आती है तो कुछ महिलाओं को पर्याप्त आराम मिलने के बावजूद नींद नहीं आती। इसी तरह भूख सामान्य से कम या अधिक लग सकती है। कुछ मामलों में मां को अपने नवजात से भावनात्मक जुड़ाव महसूस करने में कठिनाई होती है या वह स्वयं को लगातार दोषी मानने लगती है। यदि ये बदलाव लगातार बने रहें तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

यदि किसी महिला के मन में खुद को नुकसान पहुंचाने, जीवन समाप्त करने या बच्चे को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार आने लगें, तो इसे मानसिक स्वास्थ्य की आपात स्थिति माना जाता है। ऐसी परिस्थिति में बिना देरी किए मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक या संबंधित डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। समय पर उपचार और परिवार का सहयोग गंभीर स्थिति को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

किन महिलाओं में जोखिम अधिक हो सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार, जिन महिलाओं को पहले अवसाद या चिंता संबंधी समस्या रही हो, उनमें पोस्टपार्टम डिप्रेशन की आशंका अधिक हो सकती है। इसके अलावा पारिवारिक या आर्थिक तनाव, समय से पहले या जटिल प्रसव, जुड़वां बच्चों का जन्म, लगातार नींद की कमी और पर्याप्त भावनात्मक सहयोग न मिलना भी जोखिम बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं। हालांकि हर महिला का अनुभव अलग हो सकता है, इसलिए किसी भी लक्षण को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

बचाव और देखभाल के लिए क्या करें?

नई मां को पर्याप्त आराम, संतुलित भोजन और नियमित नींद का अवसर मिलना बेहद जरूरी है। परिवार और जीवनसाथी का भावनात्मक सहयोग भी मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। महिलाओं को अपनी भावनाएं खुलकर साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यदि प्रसव के दो सप्ताह बाद भी उदासी, चिंता या अन्य लक्षण बने रहें या लगातार बढ़ते दिखाई दें, तो डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना सबसे सुरक्षित कदम माना जाता है।

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