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Election Symbol – क्या किसी पार्टी को मिल सकता है कॉकरोच चुनाव चिह्न…

Election Symbol – हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर एक दिलचस्प सवाल तेजी से चर्चा में है। युवाओं के एक व्यंग्यात्मक समूह के रूप में चर्चित “कॉकरोच जनता पार्टी” को लेकर कई लोग जानना चाहते हैं कि यदि यह समूह भविष्य में राजनीतिक दल के रूप में चुनाव मैदान में उतरता है, तो क्या इसे कॉकरोच चुनाव चिह्न मिल सकता है? यह सवाल भले ही हल्का-फुल्का लगे, लेकिन इसके पीछे भारत की चुनावी व्यवस्था, चुनाव चिह्नों के नियम और निर्वाचन आयोग की प्रक्रियाओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय छिपा है।

चुनाव चिह्न व्यवस्था की शुरुआत कैसे हुई

भारत में चुनाव चिह्नों की व्यवस्था देश के शुरुआती लोकतांत्रिक दौर की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। स्वतंत्रता के बाद बड़ी आबादी पढ़ना-लिखना नहीं जानती थी, इसलिए मतदाताओं को उम्मीदवारों और दलों की पहचान आसान बनाने के लिए प्रतीकों का सहारा लिया गया। समय के साथ ये चुनाव चिह्न केवल पहचान का माध्यम नहीं रहे, बल्कि कई राजनीतिक दलों की स्थायी छवि बन गए।

चुनाव चिह्न तय करने का अधिकार किसके पास है

देश में चुनाव चिह्नों के निर्धारण, आरक्षण और आवंटन की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग के पास होती है। इसी उद्देश्य से वर्ष 1968 में Election Symbols (Reservation and Allotment) Order लागू किया गया था। यह व्यवस्था लोकसभा और विधानसभा चुनावों में सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों पर लागू होती है। आयोग ही तय करता है कि कौन-सा प्रतीक किस दल को मिलेगा और किन शर्तों के तहत उसका उपयोग किया जा सकता है।

आरक्षित और मुक्त प्रतीकों में अंतर

निर्वाचन आयोग चुनाव चिह्नों को दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित करता है। पहली श्रेणी आरक्षित प्रतीकों की होती है, जो मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों के लिए सुरक्षित रहते हैं। दूसरी श्रेणी मुक्त प्रतीकों की होती है, जिन्हें गैर-मान्यता प्राप्त दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों को आवंटित किया जा सकता है।

मुक्त प्रतीकों की सूची में रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली कई वस्तुएं शामिल होती हैं। आयोग समय-समय पर इन प्रतीकों की सूची जारी करता है, जिनमें घरेलू उपकरणों से लेकर अन्य सामान्य वस्तुएं भी शामिल रहती हैं।

क्या नई पार्टी अपनी पसंद का प्रतीक मांग सकती है

नए या गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को कुछ विकल्प सुझाने का अवसर दिया जाता है। वे मुक्त प्रतीकों की सूची से अपनी प्राथमिकताएं बता सकते हैं। इसके अलावा नए प्रतीकों का प्रस्ताव भी रखा जा सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय पूरी तरह निर्वाचन आयोग का होता है और आयोग किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार रखता है।

कॉकरोच चुनाव चिह्न मिलने की संभावना क्यों कम

यहीं सबसे महत्वपूर्ण नियम सामने आता है। चुनाव चिह्नों से जुड़े प्रावधानों के अनुसार, किसी नए दल द्वारा प्रस्तावित प्रतीक किसी मौजूदा चिह्न से मिलता-जुलता नहीं होना चाहिए। साथ ही उसमें धार्मिक या सांप्रदायिक संदेश नहीं होना चाहिए। सबसे अहम बात यह है कि नए प्रस्तावित प्रतीकों में सामान्यतः पशु या पक्षी आधारित चित्रों को अनुमति नहीं दी जाती।

इसी कारण यदि कोई नया राजनीतिक दल कॉकरोच, कुत्ता, बिल्ली, शेर, बाघ या किसी अन्य जीव-जंतु को चुनाव चिह्न बनाने का प्रस्ताव देता है, तो उसके मंजूर होने की संभावना बेहद सीमित मानी जाती है। नियमों के मौजूदा ढांचे को देखते हुए कॉकरोच आधारित चुनाव चिह्न को स्वीकृति मिलना आसान नहीं होगा।

फिर पुराने दल पशु प्रतीकों का उपयोग कैसे कर रहे हैं

भारतीय राजनीति में कई पुराने दल ऐसे हैं जिनके चुनाव चिह्न पशु आधारित रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी का हाथी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक का बाघ इसके प्रमुख उदाहरण हैं। कांग्रेस ने भी शुरुआती दशकों में दो बैलों की जोड़ी और बाद में गाय-बछड़ा जैसे प्रतीकों का उपयोग किया था।

इन दलों को यह प्रतीक उस समय आवंटित हुए थे जब नियम अपेक्षाकृत अलग थे। बाद में निर्वाचन आयोग ने नए पशु-पक्षी आधारित प्रतीकों को लेकर सख्ती अपनाई, लेकिन पहले से आवंटित चिह्नों को जारी रखा गया। यही वजह है कि पुराने राजनीतिक दल अपने ऐतिहासिक प्रतीकों का उपयोग आज भी कर सकते हैं।

नियमों में बदलाव की पृष्ठभूमि

चुनाव प्रचार के दौरान पशुओं और पक्षियों के इस्तेमाल से जुड़े विवादों के बाद आयोग ने इस विषय पर अधिक सख्त रुख अपनाया। पशु कल्याण से जुड़ी चिंताओं और चुनावी अभियानों में उनके दुरुपयोग के आरोपों के बाद नए जीव-आधारित चुनाव चिह्नों को लेकर प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया। वर्तमान व्यवस्था उसी नीति का हिस्सा मानी जाती है।

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