Defamation – राघव चड्ढा की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
Defamation – राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत अधिकारों और राजनीतिक आलोचना के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कहा कि राजनीतिक फैसलों की आलोचना को सीधे तौर पर व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुब्रह्मण्यम प्रसाद की पीठ ने की।

राजनीतिक फैसलों पर टिप्पणी को लेकर अदालत का रुख
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि किसी नेता के सार्वजनिक या राजनीतिक फैसलों पर आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। अदालत के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति राजनीतिक दल बदलता है या सार्वजनिक जीवन से जुड़ा बड़ा फैसला लेता है, तो उस पर लोगों की प्रतिक्रिया और आलोचना स्वाभाविक मानी जाएगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राजनीतिक गतिविधियों को पूरी तरह निजी अधिकारों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
मानहानि के विकल्प की ओर इशारा
दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके खिलाफ कही गई बातों से उसकी छवि को नुकसान पहुंचा है, तो उसके लिए मानहानि का कानूनी रास्ता उपलब्ध है। अदालत ने संकेत दिया कि हर आलोचना को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जा सकता। न्यायालय का मानना था कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को आलोचना और सार्वजनिक विमर्श के लिए तैयार रहना पड़ता है।
एआई से बने वीडियो पर भी हुई चर्चा
मामले की सुनवाई के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI तकनीक से तैयार वीडियो का मुद्दा भी उठा। कोर्ट ने इस संबंध में कहा कि यदि किसी विशेष वीडियो या सामग्री को लेकर आपत्ति है, तो उसके खिलाफ अलग से उपयुक्त कानूनी याचिका दाखिल की जा सकती है। अदालत ने व्यापक स्तर पर किसी तरह की सामान्य रोक लगाने की मांग को उचित नहीं माना।
व्यापक प्रतिबंध लगाने से अदालत का इनकार
कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि बिना किसी विशेष सामग्री का उल्लेख किए व्यापक प्रतिबंध की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने माना कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर उपलब्ध सामग्री के मामलों में स्पष्ट तथ्यों और विशिष्ट शिकायतों के आधार पर ही कार्रवाई संभव है। न्यायालय ने यह भी दोहराया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है