MentalHealth – केजीएमयू में बच्चों के लिए शुरू हुई भारतीय सैंड ट्रे थेरेपी
MentalHealth – लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के मनोरोग विभाग में बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य उपचार के लिए एक नई पद्धति अपनाई जा रही है। अस्पताल में भारतीय सैंड ट्रे थेरेपी की शुरुआत की गई है, जिसके जरिए मानसिक तनाव, व्यवहार संबंधी समस्याओं और भावनात्मक उलझनों से जूझ रहे बच्चों का उपचार किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका बच्चों को दवाओं के अधिक इस्तेमाल और उनके संभावित दुष्प्रभावों से बचाने में मदद कर रहा है।

भारतीय संस्कृति से जुड़ी थीरेपी
बाल मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अमित आर्या के अनुसार इस थेरेपी की सबसे खास बात इसका भारतीय परिवेश के अनुसार तैयार किया जाना है। उन्होंने बताया कि कई जगहों पर इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक सैंड ट्रे थेरेपी में विदेशी संस्कृति से जुड़े खिलौने और प्रतीक होते हैं, जिनसे भारतीय बच्चे आसानी से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते। केजीएमयू में तैयार की गई थेरेपी में भारतीय समाज, गांव, त्योहारों, जनजातीय जीवन और विभिन्न राज्यों की झलक दिखाने वाले खिलौनों का उपयोग किया जा रहा है।
खेल के जरिए समझी जाती हैं भावनाएं
विशेष रूप से तैयार की गई रेत से भरी ट्रे में बच्चे अपनी पसंद के खिलौनों और आकृतियों को सजाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान वे बिना सीधे बातचीत किए अपनी भावनाएं और मानसिक स्थिति व्यक्त कर देते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ऑटिज्म, तनाव या व्यवहार संबंधी समस्याओं से जूझ रहे बच्चे अक्सर अपनी बातें खुलकर नहीं कह पाते, लेकिन खेल के माध्यम से वे अपने मन की स्थिति आसानी से सामने ला देते हैं।
मोबाइल की लत कम करने में मदद
डॉ. अमित आर्या का कहना है कि भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़े खिलौने बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और उन्हें सुरक्षित वातावरण का अनुभव कराते हैं। इससे मोबाइल फोन और डिजिटल स्क्रीन पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल रही है। अस्पताल में हर सप्ताह इस थेरेपी के कई सत्र आयोजित किए जाते हैं, जिनमें बच्चों और किशोरों की भागीदारी बढ़ रही है।
विशेषज्ञों की टीम कर रही निगरानी
मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक अग्रवाल के नेतृत्व में विशेषज्ञों की टीम इस थेरेपी की निगरानी कर रही है। इसमें सेंसरी इंटिग्रेशन थेरेपिस्ट और प्रशिक्षित विशेषज्ञ बच्चों के व्यवहार और प्रतिक्रिया का अध्ययन करते हैं। चिकित्सकों का कहना है कि कई मामलों में बच्चों के चिड़चिड़ेपन, तनाव और सामाजिक व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं।
दवाओं पर निर्भरता कम करने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में तनाव या नींद की दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर असर डाल सकता है। ऐसे में यह थेरेपी वैकल्पिक और सहायक उपचार के रूप में काम कर रही है। बच्चों की एकाग्रता बढ़ाने और उनकी रचनात्मक क्षमता को विकसित करने में भी यह पद्धति उपयोगी मानी जा रही है।
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी जागरूकता
डॉक्टरों के अनुसार बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को लेकर अब परिवारों में जागरूकता बढ़ रही है। अभिभावक ऐसे उपचार विकल्प तलाश रहे हैं, जिनमें बच्चों पर मानसिक दबाव कम पड़े। केजीएमयू की यह पहल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।