LegalNews – सबरीमाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, याचिकाकर्ता से पूछे तीखे सवाल…
LegalNews – महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कई अहम टिप्पणियां कीं। सबरीमाला मंदिर विवाद से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता संगठन इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन की भूमिका और मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इस तरह की जनहित याचिकाओं के दायर किए जाने के पीछे स्पष्ट और ठोस आधार होना जरूरी है।

अदालत की सख्त टिप्पणी और सवाल
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ, जिसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कर रहे हैं, ने सुनवाई के दौरान तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि आखिर इस याचिका को दायर करने की जरूरत क्या थी। अदालत ने यह भी कहा कि क्या याचिकाकर्ता स्वयं को पूरे देश का प्रतिनिधि या धार्मिक मामलों का निर्णायक मानते हैं। इस टिप्पणी से यह साफ हुआ कि अदालत याचिका की वैधता और उद्देश्य दोनों पर गहराई से विचार कर रही है।
न्यायाधीशों ने संस्था की भूमिका पर उठाए प्रश्न
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि कोई भी कानूनी संस्था व्यक्तिगत आस्था का दावा नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि विश्वास एक व्यक्तिगत विषय है, जिसे किसी संगठन के नाम पर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इसी क्रम में जस्टिस अरविंद कुमार ने भी संगठन से यह जानना चाहा कि क्या इस याचिका को दायर करने से पहले संगठन के भीतर कोई औपचारिक निर्णय लिया गया था और क्या इसे नेतृत्व की मंजूरी मिली थी।
युवा वकीलों के हितों पर ध्यान देने की सलाह
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता संगठन को यह भी सुझाव दिया कि उसे इस तरह के विवादित मुद्दों में उलझने के बजाय वकालत पेशे से जुड़े युवाओं के हितों के लिए काम करना चाहिए। अदालत ने कहा कि विशेष रूप से ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले प्रतिभाशाली युवा वकीलों को सहयोग देना अधिक सार्थक पहल हो सकती है। जस्टिस नागरत्ना ने भी इसी बात को दोहराते हुए कहा कि ऐसे प्रयासों से न्याय व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
याचिकाकर्ता की ओर से दी गई दलील
याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश अधिवक्ता रवि प्रकाश गुप्ता ने अदालत को बताया कि वर्ष 2006 में प्रकाशित कुछ समाचार रिपोर्टों के आधार पर यह जनहित याचिका दाखिल की गई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था, बल्कि भगवान अयप्पा के श्रद्धालुओं की आस्था को संरक्षित करना था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि मंदिर के तंत्री द्वारा पहले यह राय दी गई थी कि कम उम्र की महिलाओं का प्रवेश परंपरा के विपरीत है।
सबरीमाला विवाद की पृष्ठभूमि
केरल स्थित सबरीमाला मंदिर में लंबे समय से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लागू था। यह परंपरा भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी मानने की मान्यता से जुड़ी रही है। इस प्रथा को चुनौती देते हुए 2006 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसने इसे व्यापक संवैधानिक बहस का विषय बना दिया।
2018 का फैसला और उसके बाद की स्थिति
सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बहुमत से फैसला सुनाते हुए महिलाओं के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था। अदालत ने कहा था कि यह प्रतिबंध महिलाओं के समानता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। इस निर्णय के बाद देशभर में व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली, जिसमें समर्थन और विरोध दोनों शामिल थे।
इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें यह सवाल उठाया गया कि धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। वर्तमान सुनवाई उसी व्यापक बहस का हिस्सा है, जिसमें अदालत यह तय करने की कोशिश कर रही है कि आस्था और कानून के बीच रेखा कहां खींची जानी चाहिए।