UAPABail – सुप्रीम कोर्ट ने यूएपीए मामले में दोहराया जमानत सिद्धांत
UAPABail – सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी यूएपीए जैसे गंभीर मामलों में भी “जमानत नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत लागू होता है। अदालत ने जम्मू-कश्मीर के एक व्यक्ति को राहत देते हुए उसे जमानत प्रदान की, जो कथित नार्को-टेरर फंडिंग मामले में आरोपी है।

यह मामला जम्मू-कश्मीर के हैंडवाड़ा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी से जुड़ा है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी इस मामले की जांच वर्ष 2020 से कर रही है। जांच एजेंसी ने अंद्राबी पर सीमा पार से मादक पदार्थों की तस्करी और उससे प्राप्त धन के जरिए आतंकवादी गतिविधियों को आर्थिक सहायता पहुंचाने का आरोप लगाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सशर्त जमानत दी
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने आरोपी को कुछ शर्तों के साथ जमानत देने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि अंद्राबी को अपना पासपोर्ट जमा करना होगा और हर पंद्रह दिन में स्थानीय पुलिस थाने में उपस्थित होकर रिपोर्ट देनी होगी।
सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यूएपीए की धारा 43डी(5) को इस तरह नहीं देखा जा सकता कि किसी आरोपी को अनिश्चित समय तक जेल में रखा जाए। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में भी संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का सम्मान जरूरी है।
अदालत ने संविधान के मूल सिद्धांतों पर दिया जोर
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्ति की स्वतंत्रता एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मूल्य है। अदालत ने दोहराया कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद” केवल एक कानूनी वाक्य नहीं, बल्कि संविधान से निकला हुआ सिद्धांत है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी आरोपी को दोषी साबित होने से पहले निर्दोष मानने का सिद्धांत कानून के शासन की बुनियादी पहचान है। अदालत के अनुसार, केवल गंभीर आरोप लग जाने से लंबे समय तक हिरासत को स्वाभाविक नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब मुकदमे की प्रक्रिया लंबी चल रही हो।
केए नजीब फैसले का फिर किया उल्लेख
सुनवाई के दौरान अदालत ने वर्ष 2021 में दिए गए अपने चर्चित केए नजीब फैसले का भी उल्लेख किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि किसी आरोपी का मुकदमा लंबे समय तक पूरा नहीं हो पाता, तो कठोर कानूनों के बावजूद अदालतें जमानत देने पर विचार कर सकती हैं।
पीठ ने साफ कहा कि केए नजीब मामले में दिया गया निर्णय अब भी पूरी तरह प्रभावी और बाध्यकारी है। अदालत ने टिप्पणी की कि निचली अदालतें या उच्च न्यायालय इस सिद्धांत को कमजोर नहीं कर सकते। इससे यह संकेत मिला कि सुप्रीम कोर्ट यूएपीए मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को संतुलित दृष्टिकोण से देख रहा है।
हाईकोर्ट के आदेश को दी गई चुनौती
अंद्राबी ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में मोबाइल फोन रिकॉर्ड और कथित संपर्कों का हवाला दिया था, जिनसे सीमा पार सक्रिय तत्वों से जुड़ाव के संकेत मिलने की बात कही गई थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और लंबी न्यायिक प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए राहत देने का फैसला किया। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में यूएपीए से जुड़े मामलों में जमानत सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जा सकता है।