SabarimalaCase – धार्मिक परंपरा और महिला प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट में बहस तेज
SabarimalaCase – केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई ने एक बार फिर धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन को लेकर बहस को तेज कर दिया है। इस मामले की सुनवाई नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही है, जो न केवल सबरीमाला बल्कि देश के अन्य धार्मिक स्थलों पर लागू परंपराओं के व्यापक प्रभावों पर भी विचार कर रही है। सुनवाई के दौरान कई अहम संवैधानिक सवाल उठे, जिनका असर भविष्य में धार्मिक प्रथाओं की व्याख्या पर पड़ सकता है।

केंद्र सरकार ने रखा संतुलित दृष्टिकोण
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि यह मुद्दा केवल महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों के बीच का टकराव नहीं है, बल्कि धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं से जुड़ा एक जटिल विषय है। उनके अनुसार, देश में कई ऐसे धार्मिक स्थल हैं जहां विशेष नियमों के तहत पुरुषों के प्रवेश पर भी प्रतिबंध या शर्तें लागू होती हैं। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि हर परंपरा को समान पैमाने से आंकना उचित नहीं होगा।
धार्मिक परंपराओं की विविधता पर जोर
बहस के दौरान विभिन्न उदाहरणों का हवाला देते हुए यह बताया गया कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक प्रथाएं काफी विविध हैं। केरल के कोट्टनकुलंगरा श्री देवी मंदिर का उल्लेख करते हुए कहा गया कि वहां पुरुष पारंपरिक रूप से महिलाओं की तरह साड़ी पहनकर पूजा करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और स्थानीय आस्था का अभिन्न हिस्सा है। केंद्र ने यह तर्क दिया कि ऐसी विविधताओं को देखते हुए धार्मिक मान्यताओं को एक ही दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता।
2018 के फैसले पर पुनर्विचार की पृष्ठभूमि
इस मामले की जड़ सितंबर 2018 के उस फैसले में है, जब सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित किया था। उस समय अदालत ने इसे समानता के अधिकार का उल्लंघन माना था। हालांकि, इस फैसले के बाद देशभर में व्यापक बहस और विरोध-प्रदर्शन हुए, जिसके चलते 2019 में इस मामले को बड़ी संविधान पीठ को सौंप दिया गया।
संवैधानिक सवालों पर केंद्रित सुनवाई
वर्तमान सुनवाई केवल सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े व्यापक मुद्दों—जैसे धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा, मौलिक अधिकारों का संतुलन और परंपराओं की संवैधानिक वैधता—पर भी विचार किया जा रहा है। अदालत यह तय करने की कोशिश कर रही है कि क्या किसी धार्मिक प्रथा को मौलिक अधिकारों के आधार पर चुनौती दी जा सकती है, और यदि हां, तो उसकी सीमा क्या होगी।
आगे की सुनवाई पर टिकी नजरें
इस महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला देश की धार्मिक और सामाजिक संरचना पर गहरा असर डाल सकता है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत का रुख क्या होता है, इस पर न केवल कानूनी विशेषज्ञ बल्कि आम लोग भी नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में इस मामले की सुनवाई और भी अहम मोड़ ले सकती है।