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Infrastructure – ग्रेट निकोबार परियोजना पर जयराम रमेश ने केंद्र पर किया नया हमला

Infrastructure – कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने गुरुवार को ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना को लेकर केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर वह लंबे समय से अपनी चिंता सार्वजनिक रूप से दर्ज कराते रहे हैं। उनके अनुसार, द्वीप की जैव विविधता और प्राकृतिक पारिस्थितिकी को ध्यान में रखते हुए इस योजना की गंभीरता से समीक्षा की जानी चाहिए।

वर्षों से विरोध दर्ज कराने का दावा

जयराम रमेश ने एक सार्वजनिक पोस्ट के माध्यम से बताया कि उन्होंने बीते वर्षों में इस विषय पर लगातार अपनी बात विभिन्न मंचों पर रखी है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया संदेशों, संसद में दिए गए वक्तव्यों और केंद्रीय मंत्रियों को भेजे गए पत्रों का संकलन साझा करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य इस परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय पहलुओं पर व्यापक चर्चा को बढ़ावा देना रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित मंत्रालयों से प्राप्त जवाबों को भी उन्होंने सार्वजनिक किया है ताकि लोग पूरे घटनाक्रम को समझ सकें।

प्रधानमंत्री और सरकार की नीति पर सवाल

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित परियोजना द्वीप के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार इस योजना को आगे बढ़ाने के अपने फैसले पर कायम दिखाई दे रही है, जबकि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कई मुद्दों पर अब भी चिंताएं बनी हुई हैं। रमेश का कहना है कि इस विषय पर भविष्य में भी वह सार्वजनिक स्तर पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराते रहेंगे।

न्यायालय में लंबित हैं कई याचिकाएं

रमेश ने बताया कि इस परियोजना से जुड़े विभिन्न पहलुओं को लेकर जनहित में कई याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनकी सुनवाई कलकत्ता उच्च न्यायालय में जारी है। उनके अनुसार, इन याचिकाओं में पर्यावरणीय नियमों और कानूनी प्रावधानों के पालन को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से इन मुद्दों पर विस्तृत परीक्षण किया जा रहा है।

किन मुद्दों को बनाया गया है आधार

उन्होंने जानकारी दी कि याचिकाओं में कैम्पबेल बे राष्ट्रीय उद्यान और गलाथिया राष्ट्रीय उद्यान से जुड़े पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र संबंधी अधिसूचनाओं के कथित उल्लंघन का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा वन अधिकार अधिनियम, 2006, तटीय क्षेत्र विनियमन अधिसूचना, 2019 तथा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुपालन से जुड़े प्रश्न भी उठाए गए हैं। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के 16 फरवरी 2026 के आदेश को भी विभिन्न आधारों पर चुनौती दिए जाने की बात सामने आई है।

सरकार ने बताए परियोजना के उद्देश्य

दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि ग्रेट निकोबार परियोजना का उद्देश्य भारत की समुद्री और रणनीतिक क्षमताओं को मजबूत करना है। सरकार के अनुसार, द्वीप की अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्ग के निकट स्थिति का लाभ उठाते हुए एक आधुनिक ट्रांसशिपमेंट हब विकसित करने की योजना है। इससे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करने, राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती देने और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई गई है।

परियोजना में क्या-क्या शामिल है

सरकारी योजना के अनुसार, इस परियोजना में लगभग 14.2 मिलियन ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट क्षमता वाला अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल विकसित किया जाना प्रस्तावित है। इसके साथ 4,000 यात्रियों की क्षमता वाला ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, 450 एमवीए क्षमता का गैस एवं सौर ऊर्जा आधारित संयंत्र और एक नियोजित आधुनिक टाउनशिप भी बनाई जानी है। फिलहाल परियोजना को लेकर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है।

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