IED – अब भी सुरक्षा बलों की चुनौती बने हुए हैं नक्सल प्रभावित इलाकों में दबे विस्फोटक
IED – देश के कई नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा अभियानों के बाद हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के सामने एक नई चुनौती बनी हुई है। जंगलों और ग्रामीण रास्तों में वर्षों के दौरान दबाए गए इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) अब भी खतरा पैदा कर रहे हैं। इन्हें खोजकर सुरक्षित तरीके से निष्क्रिय करने के लिए सुरक्षा बल लगातार सर्च अभियान चला रहे हैं, ताकि आम लोगों और जवानों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

अलग-अलग तकनीक से लगाए गए थे विस्फोटक
सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, नक्सलियों ने बीते वर्षों में विभिन्न प्रकार के आईईडी का इस्तेमाल किया था। इनमें रिमोट कंट्रोल, कमांड आधारित, प्रेशर एक्टिवेटेड, इंफ्रारेड, मैग्नेटिक ट्रिगर और ट्रिप वायर जैसी तकनीकों से संचालित विस्फोटक शामिल हैं। इन उपकरणों का उद्देश्य सुरक्षा बलों की आवाजाही वाले मार्गों को निशाना बनाना था। अधिकांश आईईडी बैटरी से संचालित होते हैं, इसलिए उनकी कार्यक्षमता बैटरी की स्थिति पर निर्भर रहती है।
बरसात से कई आईईडी हुए निष्क्रिय
जानकारी के अनुसार, छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगलों में जमीन के भीतर दबाए गए कई आईईडी लगातार बारिश और नमी के कारण प्रभावित हुए हैं। पानी भरने से उनकी बैटरियां काम करना बंद कर रही हैं, जिससे उनमें विद्युत प्रवाह नहीं हो पा रहा है। सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि इससे संभावित खतरे में कुछ कमी आई है, लेकिन जब तक सभी विस्फोटकों की पहचान कर उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाया नहीं जाता, तब तक जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा सकता।
पुराने मार्गों पर अब भी बनी हुई है आशंका
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, पिछले दो वर्षों के दौरान नक्सलियों ने कई कच्चे और पक्के रास्तों पर बड़ी संख्या में आईईडी लगाए थे। उस समय सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव के कारण आमने-सामने की मुठभेड़ की बजाय विस्फोटकों का सहारा लिया गया था। अब जिन इलाकों में नक्सली गतिविधियां काफी हद तक नियंत्रित हो चुकी हैं, वहां भी जमीन के नीचे दबे ये विस्फोटक सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों के लिए सतर्कता का विषय बने हुए हैं।
पहले बदली जाती थीं बैटरियां
सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, जब नक्सली गतिविधियां अधिक सक्रिय थीं, तब बरसात शुरू होने से पहले कई बार आईईडी की बैटरियां निकाल ली जाती थीं या आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बदल दिया जाता था। यदि लंबे समय तक किसी विस्फोटक का उपयोग नहीं होता था, तो उसकी बैटरी को फिर से लगाया या बदला जाता था ताकि वह सक्रिय बना रहे। वर्तमान में लगातार चल रहे सुरक्षा अभियानों के कारण नक्सली संगठनों की गतिविधियां सीमित हुई हैं, जिससे ऐसी प्रक्रिया पहले की तुलना में काफी कम हो गई है।
सर्च अभियान पर सुरक्षा बलों का विशेष जोर
सुरक्षा बल अब प्रभावित क्षेत्रों में नियमित गश्त के साथ व्यापक सर्च और डिमाइनिंग अभियान चला रहे हैं। इन अभियानों का उद्देश्य जंगलों, पगडंडियों और संवेदनशील मार्गों पर छिपे विस्फोटकों का पता लगाकर उन्हें निष्क्रिय करना है। अधिकारियों का मानना है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में सामान्य गतिविधियों को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए आईईडी की पहचान और उनका सुरक्षित निष्पादन सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में शामिल है। इसी दिशा में सुरक्षा एजेंसियां तकनीकी उपकरणों और विशेषज्ञ टीमों की मदद से लगातार अभियान चला रही हैं।