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ImposterSyndrome – सफलता के बाद भी खुद पर संदेह, जानिए क्या है इंपोस्टर सिंड्रोम…

ImposterSyndrome – कई लोग अच्छी नौकरी, पढ़ाई या किसी बड़ी उपलब्धि के बाद भी यह महसूस करते हैं कि वे उस सफलता के वास्तविक हकदार नहीं हैं। उन्हें लगता है कि उनकी उपलब्धियां केवल किस्मत, सही समय या दूसरों की मदद का परिणाम हैं। मनोविज्ञान में इस स्थिति को इंपोस्टर सिंड्रोम कहा जाता है। यह कोई मानसिक बीमारी नहीं है, लेकिन लंबे समय तक बने रहने पर व्यक्ति के आत्मविश्वास, करियर, पढ़ाई और व्यक्तिगत जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

क्या होता है इंपोस्टर सिंड्रोम?

इंपोस्टर सिंड्रोम ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपनी योग्यता और उपलब्धियों पर भरोसा नहीं कर पाता। सफलता मिलने के बाद भी उसे लगता है कि वह उतना सक्षम नहीं है, जितना दूसरे लोग उसे मानते हैं। कई लोगों के मन में यह डर भी बना रहता है कि एक दिन उनकी वास्तविक क्षमता सबके सामने आ जाएगी। यह स्थिति किसी भी उम्र या पेशे के लोगों में देखी जा सकती है। छात्र, नौकरीपेशा कर्मचारी, डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार, उद्यमी और अन्य पेशेवर भी इसका अनुभव कर सकते हैं।

किन संकेतों से की जा सकती है पहचान?

विशेषज्ञों के अनुसार, इंपोस्टर सिंड्रोम के कुछ सामान्य संकेत होते हैं। अपनी सफलता का श्रेय खुद को न देना, लगातार दूसरों से तुलना करना, हर काम में पूर्णता की अपेक्षा रखना, प्रशंसा मिलने पर असहज महसूस करना और छोटी-सी गलती को बड़ी असफलता मान लेना इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं। कई लोग नई जिम्मेदारियां लेने से भी बचते हैं, क्योंकि उन्हें असफल होने या दूसरों की उम्मीदों पर खरा न उतरने का डर बना रहता है।

किन कारणों से बढ़ सकती है यह समस्या?

इंपोस्टर सिंड्रोम के पीछे कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। बचपन में लगातार तुलना होना, केवल उत्कृष्ट प्रदर्शन पर ही प्रशंसा मिलना या हर काम में परफेक्शन की अपेक्षा रखना इस भावना को बढ़ा सकता है। नई नौकरी, प्रमोशन, कॉलेज में प्रवेश या किसी नए माहौल में शुरुआत के दौरान भी कई लोग अपनी क्षमता पर संदेह करने लगते हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की उपलब्धियां लगातार देखने से भी तुलना की भावना बढ़ती है और अपनी सफलता कम महत्वपूर्ण लगने लगती है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो तनाव, चिंता, आत्मविश्वास में कमी और काम से जुड़ी थकान जैसी समस्याएं भी विकसित हो सकती हैं।

इससे बाहर निकलने के लिए क्या करें?

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे पहले अपनी उपलब्धियों को स्वीकार करना और उन्हें याद रखना जरूरी है। अपनी सफलताओं की सूची बनाकर समय-समय पर उसे पढ़ना आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद कर सकता है। नकारात्मक विचार आने पर यह परखना भी जरूरी है कि उनके पीछे कोई वास्तविक आधार है या नहीं। दूसरों से तुलना करने के बजाय अपनी प्रगति पर ध्यान देना अधिक लाभदायक माना जाता है। यदि खुद को अयोग्य मानने की भावना लगातार बनी रहे और इसका असर काम, पढ़ाई या रिश्तों पर पड़ने लगे, तो किसी मनोवैज्ञानिक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित हो सकता है। समय पर सही मार्गदर्शन मिलने से इस स्थिति से बाहर निकलना आसान हो सकता है

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