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LegalProtection – सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लिव-इन संबंधों में महिलाओं के अधिकारों पर आई नई स्पष्टता

LegalProtection– लिव-इन संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या दी है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं को भी घरेलू क्रूरता से जुड़े आपराधिक कानून का संरक्षण मिल सकता है। अदालत ने यह भी साफ किया कि यह राहत हर लिव-इन संबंध पर स्वतः लागू नहीं होगी, बल्कि इसके लिए तय कानूनी मानदंडों का पूरा होना आवश्यक रहेगा।

कर्नाटक के मामले से जुड़ा है पूरा विवाद

यह मामला कर्नाटक से सामने आया, जहां एक महिला ने अपने साथी के खिलाफ क्रूरता का आरोप लगाते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। आरोपी ने अदालत में दलील दी कि दोनों के बीच वैध विवाह नहीं हुआ था, इसलिए उस पर यह प्रावधान लागू नहीं हो सकता। हालांकि कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि यदि किसी महिला को विवाह का भरोसा देकर उसके साथ पति-पत्नी जैसा जीवन बिताया गया है, तो केवल तकनीकी आधार पर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने किन परिस्थितियों में दी कानूनी सुरक्षा

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि यदि कोई लिव-इन संबंध व्यवहारिक रूप से विवाह जैसा हो और दोनों पक्षों का विवाह करने का वास्तविक इरादा रहा हो, तो ऐसी स्थिति में महिला को अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 के तहत भी संरक्षण मिल सकता है। अदालत ने माना कि घरेलू क्रूरता केवल औपचारिक विवाह तक सीमित नहीं होती और समान परिस्थितियों में महिलाओं को कानून से वंचित नहीं किया जा सकता।

हर लिव-इन संबंध को नहीं मिलेगा यह लाभ

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल साथ रहना पर्याप्त नहीं होगा। अदालत ने कुछ आवश्यक शर्तें निर्धारित की हैं। इनमें दोनों व्यक्तियों का बालिग होना, अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रहना, संबंध का विवाह जैसा स्वरूप होना और भविष्य में विवाह करने का वास्तविक इरादा शामिल है। इन आधारों पर ही अदालत यह तय करेगी कि संबंधित मामला कानूनी संरक्षण के दायरे में आता है या नहीं।

विवाह जैसे संबंध की पहचान कैसे होगी

अदालत ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी संबंध की प्रकृति का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर किया जाएगा। इसमें यह देखा जाएगा कि दोनों कितने समय तक साथ रहे, क्या वे एक ही घर में पति-पत्नी की तरह रहते थे, घरेलू जिम्मेदारियां साझा करते थे या नहीं, आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर थे या संसाधनों का साझा उपयोग करते थे। साथ ही समाज में उनकी पहचान और संबंध की स्थिरता भी महत्वपूर्ण पहलू माने जाएंगे।

घरेलू हिंसा कानून और आपराधिक कानून में अंतर

सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 पहले से ही लिव-इन संबंधों में महिलाओं को सुरक्षा देता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अधिनियम मुख्य रूप से सिविल प्रकृति का कानून है, जिसके तहत संरक्षण आदेश, भरण-पोषण और रहने के अधिकार जैसी राहत मिलती है। दूसरी ओर BNS की धारा 85 एक आपराधिक प्रावधान है, जिसके तहत एफआईआर, जांच और दोष सिद्ध होने पर सजा का प्रावधान है। इसलिए दोनों कानूनों की भूमिका अलग-अलग है।

गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया पर भी दिया निर्देश

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी की प्रक्रिया पहले से तय न्यायिक दिशानिर्देशों के अनुसार ही होगी। पुलिस केवल शिकायत दर्ज होने के आधार पर तत्काल गिरफ्तारी नहीं करेगी। पहले प्रारंभिक जांच की जाएगी और उसके बाद उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी। यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य फैसले के अनुरूप रहेगी।

भारत में लिव-इन संबंधों की वर्तमान कानूनी स्थिति

देश में लिव-इन संबंधों के लिए अलग से कोई केंद्रीय कानून मौजूद नहीं है। इनकी कानूनी स्थिति समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और मौजूदा कानूनों की व्याख्या से विकसित हुई है। अदालत पहले भी स्पष्ट कर चुकी है कि दो बालिग व्यक्तियों का अपनी इच्छा से बिना विवाह साथ रहना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। हालांकि संपत्ति, उत्तराधिकार और वैवाहिक अधिकारों जैसे मामलों में लिव-इन संबंधों को स्वतः वैवाहिक दर्जा प्राप्त नहीं होता और ऐसे मामलों में अलग कानूनी प्रावधान लागू होते हैं।

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