SleepHealth – कृत्रिम रोशनी से बिगड़ती जैविक घड़ी, बढ़ रहे रोगों के खतरे…
SleepHealth – आधुनिक जीवनशैली में रात के समय कृत्रिम रोशनी का बढ़ता उपयोग अब स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंता का कारण बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर की आंतरिक कार्यप्रणाली पर गहरा असर डाल रहा है। खासतौर पर शयन कक्षों में सजावटी लाइट्स का चलन तेजी से बढ़ा है, जो दिखने में आकर्षक जरूर लगता है, लेकिन इसके दुष्प्रभाव अब सामने आने लगे हैं।

अंधेरे की कमी से प्रभावित हो रही नींद की गुणवत्ता
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के मनोरोग विभाग से जुड़े मनोचिकित्सक डॉ. सुजीत कुमार बताते हैं कि मानव शरीर की जैविक घड़ी अंधेरे और रोशनी के संतुलन पर निर्भर करती है। रात के समय अंधेरा होने पर मस्तिष्क में मेलाटोनिन नामक हार्मोन का स्राव होता है, जो नींद को गहरा और आरामदायक बनाता है। लेकिन जब सोते समय भी कमरे में रोशनी बनी रहती है, तो यह प्रक्रिया बाधित हो जाती है। परिणामस्वरूप लोगों में अनिद्रा, बेचैनी और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। शहरों में यह स्थिति अधिक देखने को मिल रही है, जहां कृत्रिम रोशनी से पूरी तरह बच पाना मुश्किल होता है।
दिल के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा असर
हृदय रोग विशेषज्ञ प्रो. ऋषि सेठी के अनुसार, रात के समय लगातार कृत्रिम रोशनी के संपर्क में रहने से हृदय संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। विशेष रूप से रात 12 बजे से सुबह 6 बजे के बीच शरीर को पूर्ण विश्राम की आवश्यकता होती है। यदि इस दौरान भी रोशनी बनी रहती है, तो नींद की गुणवत्ता खराब होती है और तनाव का स्तर बढ़ जाता है। यह स्थिति लंबे समय में हृदय रोगों की संभावना को बढ़ा सकती है। उन्होंने यह भी बताया कि शरीर की प्राकृतिक लय के बिगड़ने से रक्तचाप और हृदय गति पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
कैंसर से लड़ने की क्षमता हो सकती है कमजोर
केजीएमयू के स्त्री कैंसर विभाग की अध्यक्ष प्रो. निशा सिंह के अनुसार, मेलाटोनिन हार्मोन केवल नींद के लिए ही नहीं, बल्कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस हार्मोन का स्तर कम होने पर शरीर की ट्यूमर से लड़ने की क्षमता कमजोर हो सकती है। कुछ शोधों में यह भी संकेत मिले हैं कि लंबे समय तक कृत्रिम रोशनी के संपर्क में रहने से त्वचा कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि इस विषय पर अभी और शोध की आवश्यकता है, लेकिन शुरुआती निष्कर्ष चिंता बढ़ाने वाले हैं।
बदलती जीवनशैली में बढ़ रही समस्या
आज के समय में लोग देर रात तक मोबाइल, लैपटॉप और टीवी का उपयोग करते हैं, जिससे आंखों और मस्तिष्क को लगातार कृत्रिम रोशनी मिलती रहती है। यह आदत धीरे-धीरे शरीर की प्राकृतिक दिनचर्या को प्रभावित करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या केवल नींद तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर असर डालती है। खासतौर पर युवा पीढ़ी इस आदत से अधिक प्रभावित हो रही है।
स्वस्थ दिनचर्या के लिए जरूरी सावधानियां
डॉक्टरों का सुझाव है कि सोने से कम से कम एक घंटा पहले सभी डिजिटल उपकरणों से दूरी बना लेनी चाहिए। शयन कक्ष में पूरी तरह अंधेरा रखना बेहतर माना जाता है। यदि बाहर से रोशनी आती है, तो मोटे पर्दों का उपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा, रात के समय अनावश्यक लाइट्स बंद रखना और प्राकृतिक नींद के चक्र को बनाए रखना जरूरी है। छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करके इन खतरों से काफी हद तक बचा जा सकता है।