PolymerNotes – RBI फिर कर रहा प्लास्टिक बैंकनोटों के परीक्षण की तैयारी
PolymerNotes- देश में डिजिटल भुगतान का दायरा लगातार बढ़ने के बावजूद नकदी का उपयोग कम नहीं हुआ है। इसी को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बार फिर पॉलीमर यानी प्लास्टिक बैंकनोटों को चलन में लाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, केंद्रीय बैंक जल्द ही पॉलीमर नोटों के पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा कर सकता है। यदि यह योजना आगे बढ़ती है तो पिछले 16 वर्षों में यह तीसरी बार होगा, जब भारत में प्लास्टिक बैंकनोटों को लेकर गंभीर पहल की जाएगी।

क्या हैं पॉलीमर बैंकनोट?
पॉलीमर बैंकनोट विशेष प्रकार की प्लास्टिक आधारित सामग्री से तैयार किए जाते हैं। ये सामान्य कागजी नोटों की तरह मुलायम और लचीले होते हैं, इसलिए इन्हें आसानी से मोड़ा और रोजमर्रा के लेनदेन में इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि इन्हें प्लास्टिक नोट कहा जाता है, लेकिन इनका स्वरूप डेबिट या क्रेडिट कार्ड जैसा कठोर नहीं होता। इनकी सबसे बड़ी विशेषता लंबी उपयोग अवधि और बेहतर मजबूती मानी जाती है।
कागजी नोटों से क्यों हैं अलग?
पॉलीमर नोट नमी, गंदगी और फटने जैसी समस्याओं के प्रति अधिक टिकाऊ माने जाते हैं। सामान्य कागजी नोटों की तुलना में इनकी आयु अधिक होती है, जिससे बार-बार नए नोट छापने की आवश्यकता कम हो सकती है। इनमें पारदर्शी विंडो, उन्नत सुरक्षा फीचर, विशेष स्याही और अन्य आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है, जिससे नकली नोट तैयार करना पहले की तुलना में काफी कठिन हो जाता है।
RBI दोबारा क्यों कर रहा है विचार?
रिजर्व बैंक की हालिया वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में बैंकनोटों की छपाई पर 6,372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है। इसी अवधि में लगभग 23.8 अरब पुराने और क्षतिग्रस्त नोटों को चलन से बाहर किया गया। सबसे अधिक खराब होने वाले नोटों में 100 और 500 रुपये के नोट शामिल रहे, जबकि 10 और 20 रुपये के नोट लगातार उपयोग के कारण जल्दी खराब हो जाते हैं। ऐसे में अधिक टिकाऊ नोटों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
पहले के प्रयास क्यों नहीं हो सके सफल?
भारत में पहली बार वर्ष 2010 में पॉलीमर नोटों को लाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। बाद में 2013-14 तक इस दिशा में काम आगे बढ़ा और वर्ष 2017 में भी सरकार ने 10 रुपये के पॉलीमर नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दी थी। हालांकि उस समय एटीएम, कैश डिपॉजिट मशीनों और नोट गिनने वाली मशीनों को नए नोटों के अनुरूप तैयार करना चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। इसके अलावा पॉलीमर शीट पूरी तरह आयात करनी पड़ती थी, जिससे परियोजना की लागत बढ़ गई और योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
इस बार क्या बदलेगी रणनीति?
रिपोर्ट के अनुसार, इस बार केवल पॉलीमर शीट आयात करने के बजाय भारत में ही इसके उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। RBI ऐसी कंपनियों की तलाश कर रहा है जो देश के भीतर पॉलीमर शीट का निर्माण कर सकें। इससे आयात पर निर्भरता घटने के साथ लागत में भी कमी आने की उम्मीद है। साथ ही एटीएम, कैश डिपॉजिट मशीनों और नोट प्रोसेसिंग सिस्टम को भी नए नोटों के अनुकूल बनाने की तैयारी की जा रही है।
पहले छोटे मूल्यवर्ग के नोटों पर होगा परीक्षण
प्रारंभिक चरण में 10 और 20 रुपये के पॉलीमर नोटों का परीक्षण किए जाने की संभावना है। ये वही मूल्यवर्ग हैं जिनका इस्तेमाल सबसे अधिक होता है और जो जल्दी खराब हो जाते हैं। यदि पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है और तकनीकी व्यवस्था संतोषजनक साबित होती है, तो भविष्य में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों पर भी विचार किया जा सकता है। वर्तमान में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर और मलेशिया सहित 60 से अधिक देशों में पॉलीमर बैंकनोट पूरी तरह या आंशिक रूप से उपयोग में हैं।