EthanolBlend – पेट्रोल में इथेनॉल बढ़ाने की नीति पर शुरू हुई नई चर्चा
EthanolBlend – भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की नीति पिछले एक दशक में तेजी से आगे बढ़ी है। अब केंद्र सरकार के हालिया फैसले ने संकेत दिए हैं कि आने वाले समय में ईंधन में इथेनॉल की मात्रा और बढ़ाई जा सकती है। सरकार ने 20 प्रतिशत से अधिक इथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क को शून्य करने का निर्णय लिया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब देश में व्यापक स्तर पर अभी ई-20 ईंधन ही प्रचलन में है। इस फैसले ने ऊर्जा नीति, वाहन उद्योग और किसानों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

इथेनॉल मिश्रण का सफर कैसे आगे बढ़ा
भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की शुरुआत सीमित स्तर पर हुई थी। वर्ष 2014 तक पेट्रोल में इथेनॉल की औसत मात्रा बहुत कम थी और अधिकांश स्थानों पर लगभग शुद्ध पेट्रोल ही उपलब्ध रहता था। बाद के वर्षों में सरकार ने चरणबद्ध तरीके से इस अनुपात को बढ़ाया और ई-10 ईंधन को बढ़ावा दिया।
इसके बाद नीति निर्माण और उत्पादन क्षमता में वृद्धि के साथ ई-20 लक्ष्य को तेज गति से आगे बढ़ाया गया। सरकार ने निर्धारित समयसीमा से पहले ही कई महत्वपूर्ण लक्ष्य हासिल किए और देश के अधिकांश हिस्सों में ई-20 ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित की गई।
नए फैसले के क्या हैं संकेत
हाल ही में केंद्र सरकार ने ई-22, ई-25, ई-27 और ई-30 जैसे उच्च इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों पर उत्पाद शुल्क समाप्त करने का निर्णय लिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भविष्य में अधिक इथेनॉल मिश्रित ईंधन को बढ़ावा देने की तैयारी का संकेत हो सकता है।
हालांकि ऐसे ईंधन अभी आम उपयोग में नहीं हैं, लेकिन नीति स्तर पर की गई यह पहल तेल कंपनियों और इथेनॉल उद्योग को भविष्य की दिशा के बारे में स्पष्ट संदेश देती है। इससे उत्पादन और वितरण संबंधी योजनाओं को भी नई गति मिल सकती है।
आयातित तेल पर निर्भरता कम करने की कोशिश
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल के उपयोग को बढ़ाना ऊर्जा सुरक्षा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। अधिक इथेनॉल मिश्रण से पेट्रोल की खपत में कमी लाने और विदेशी तेल पर निर्भरता घटाने का लक्ष्य रखा गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि उच्च मिश्रण वाले ईंधन का उपयोग बढ़ता है तो इससे दीर्घकालिक स्तर पर आयात बिल को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। यही कारण है कि सरकार जैव ईंधन आधारित विकल्पों को लगातार प्रोत्साहित कर रही है।
किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल सकता है लाभ
इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ना और मक्का जैसे कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। ऐसे में इसकी मांग बढ़ने से कृषि क्षेत्र को अतिरिक्त बाजार मिलने की संभावना रहती है। जानकारों का कहना है कि इससे किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में सहायता मिल सकती है।
इथेनॉल उत्पादन क्षमता में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि नई नीतियां इस अतिरिक्त क्षमता के बेहतर उपयोग का रास्ता खोल सकती हैं।
वाहन मालिकों के लिए क्या हैं चुनौतियां
उच्च इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन को लेकर सबसे बड़ी चिंता वाहनों की अनुकूलता को लेकर है। देश में बड़ी संख्या में ऐसे वाहन हैं जिन्हें ई-10 या ई-20 ईंधन को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि इन वाहनों में अधिक इथेनॉल वाले ईंधन के उपयोग से प्रदर्शन और रखरखाव पर असर पड़ सकता है।
कुछ मामलों में माइलेज में कमी और ईंधन प्रणाली के कुछ हिस्सों पर अतिरिक्त दबाव की आशंका भी जताई जाती है। इसी कारण वाहन उद्योग और नीति निर्माता इस बदलाव को चरणबद्ध तरीके से लागू करने के पक्ष में दिखाई देते हैं।
आगे की रणनीति पर नजर
सरकार फिलहाल उच्च इथेनॉल मिश्रण को अनिवार्य बनाने की दिशा में जल्दबाजी करती नहीं दिख रही है। रिपोर्टों के अनुसार, भविष्य में अलग-अलग प्रकार के ईंधन के लिए अलग वितरण व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जिससे वाहन मालिक अपनी गाड़ी की क्षमता के अनुसार उपयुक्त ईंधन चुन सकें।
साथ ही फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक वाले वाहनों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है। ऐसे वाहन विभिन्न स्तर के इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन पर चलने में सक्षम होते हैं और भविष्य की ऊर्जा रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।