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EdibleOilPrices – कच्चे तेल की महंगाई से देश में बढ़े खाद्य तेलों के दाम

EdibleOilPrices – पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब सीधे तौर पर आम लोगों की रसोई पर दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी और आपूर्ति तंत्र पर दबाव के कारण देश में खाद्य तेल लगातार महंगे हो रहे हैं। बीते करीब दस दिनों में ही रिफाइंड और सरसों तेल के दाम थोक बाजार में 7 से 12 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ चुके हैं। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वैश्विक हालात में सुधार नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में कीमतों में और इजाफा हो सकता है।

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर

हाल के अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम के चलते कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। इससे बायोडीजल उत्पादन फिर से लाभकारी हो गया है, जिसके चलते कई बड़े उत्पादक देश खाद्य तेलों का उपयोग ईंधन के रूप में करने लगे हैं। इंडोनेशिया, मलेशिया, अमेरिका और अर्जेंटीना जैसे देशों में यह रुझान तेजी से बढ़ा है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि खाने वाले तेलों की वैश्विक उपलब्धता में कमी आई है और कीमतें ऊपर जाने लगी हैं।

पाम ऑयल की आपूर्ति पर बढ़ा दबाव

पाम ऑयल के उत्पादन और निर्यात में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। इंडोनेशिया ने बायोडीजल मिश्रण को 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसका मतलब है कि पाम ऑयल का बड़ा हिस्सा अब घरेलू ईंधन जरूरतों में इस्तेमाल हो रहा है, जिससे निर्यात घट गया है। वैश्विक बाजार में पाम ऑयल की कमी के कारण कीमतें बढ़ी हैं, जिसका असर रिफाइंड तेल समेत अन्य खाद्य तेलों पर भी पड़ा है।

सोयाबीन और सूरजमुखी तेल भी हुए महंगे

पाम ऑयल के महंगा होने से केवल एक ही श्रेणी प्रभावित नहीं हुई है, बल्कि इसका असर दूसरे तेलों पर भी दिख रहा है। सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के दामों में भी तेजी दर्ज की गई है। भारत जैसे देश, जो खाद्य तेलों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, वहां यह असर और अधिक महसूस किया जा रहा है। घरेलू बाजार में कीमतों का बढ़ना सीधे उपभोक्ताओं के खर्च को प्रभावित कर रहा है।

युद्ध और परिवहन लागत ने बढ़ाई मुश्किलें

मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष ने शिपिंग मार्गों को प्रभावित किया है, जिससे मालभाड़ा लगभग 25 प्रतिशत तक बढ़ गया है। इसके अलावा उत्पादन से जुड़े अन्य खर्च भी तेजी से बढ़े हैं। कोयले की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत और प्लास्टिक पैकेजिंग की लागत में करीब 60 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। टिन और अन्य पैकेजिंग सामग्री भी महंगी हो गई हैं। डॉलर की मजबूती ने आयात को और महंगा बना दिया है, जिससे कुल लागत पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

बाजार में बढ़ती कीमतों का असर

थोक बाजार के कारोबारियों के अनुसार सरसों तेल की कीमत 132 रुपये से बढ़कर करीब 140 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है। वहीं सूरजमुखी और अन्य खाद्य तेलों में भी 10 से 15 रुपये प्रति लीटर तक का उछाल देखा गया है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े उपभोक्ता राज्य में इसका असर ज्यादा दिखाई दे रहा है, जहां खाद्य तेल की सालाना खपत लगभग 500 करोड़ लीटर है। औसतन 10 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी से उपभोक्ताओं पर करीब 5000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा है।

उद्योग और उपभोक्ताओं पर बढ़ता दबाव

राज्य में करीब 35 बड़े तेल प्रसंस्करण संयंत्र सक्रिय हैं, जो देश के विभिन्न हिस्सों में आपूर्ति करते हैं। उत्पादन लागत में 20 से 25 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे उद्योग पर भी दबाव बढ़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक स्तर पर तनाव कम नहीं हुआ और आपूर्ति में सुधार नहीं आया, तो कीमतों में स्थिरता आने में समय लग सकता है। फिलहाल उपभोक्ताओं को महंगे तेल के साथ ही काम चलाना पड़ सकता है।

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