Economy – त्योहारी सीजन से पहले चीनी और चावल महंगे, बढ़ते दामों ने बढ़ाई चिंता
Economy– देश में त्योहारी मौसम की शुरुआत के साथ ही आम लोगों पर महंगाई का दबाव बढ़ने लगा है। चीनी और चावल जैसी रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुओं की कीमतों में पिछले एक महीने के दौरान उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कमजोर मानसून, वैश्विक बाजार की अनिश्चितता और जमाखोरी जैसी परिस्थितियों ने खाद्य वस्तुओं की कीमतों को प्रभावित किया है, जिसका असर अब घरेलू बजट पर भी दिखाई देने लगा है।

चीनी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में चीनी की औसत थोक कीमत पिछले एक महीने में 5 प्रतिशत से अधिक बढ़कर लगभग 4,593 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई है। यदि पिछले एक वर्ष की तुलना की जाए तो इसमें 7.64 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। खुदरा बाजार में भी चीनी की कीमत बढ़ी है। एक महीने पहले जहां इसकी औसत खुदरा कीमत 47.11 रुपये प्रति किलोग्राम थी, वहीं 3 अगस्त 2026 तक यह बढ़कर 49.53 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गई। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्पादन और आपूर्ति से जुड़े कारकों का सीधा असर बाजार पर पड़ा है।
चावल के दाम में भी दर्ज हुई तेजी
चावल की कीमतों में भी बढ़ोतरी का सिलसिला जारी है। अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य एक महीने में 44.13 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 45.13 रुपये प्रति किलोग्राम हो गया है। दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में चावल की कीमतों में 10 से 15 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी गई है। इससे परिवारों के मासिक राशन खर्च में बढ़ोतरी हुई है और घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव महसूस किया जा रहा है।
उत्पादन और मौसम को लेकर जताई गई आशंका
प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना कृषि विश्वविद्यालय की ओर से जारी एक नीति पत्र में संकेत दिया गया है कि यदि अल-नीनो के प्रभाव से चावल उत्पादन प्रभावित होता है और एहतियात के तौर पर बड़े पैमाने पर भंडारण बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल की कीमतों में 30 से 50 प्रतिशत तक उछाल आ सकता है। रिपोर्ट में बढ़ती ऊर्जा और उर्वरक लागत के साथ एशिया के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मौसम संबंधी जोखिमों को भी कीमतों में तेजी की संभावित वजह बताया गया है।
चीनी महंगी होने के पीछे ये प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में पुराने स्टॉक का कम होना तथा गन्ने का एक हिस्सा इथेनॉल उत्पादन के लिए उपयोग किए जाने से बाजार में उपलब्धता प्रभावित हुई है। क्षेत्रीय स्तर पर आपूर्ति का संतुलन बिगड़ने के कारण कीमतों में तेजी आई है। इसका असर आने वाले समय में मिठाई, बेकरी और प्रोसेस्ड खाद्य उत्पादों की लागत पर भी देखने को मिल सकता है।
जमाखोरी और कम बारिश ने बढ़ाई चुनौती
चावल की कीमतों में बढ़ोतरी के पीछे अल-नीनो से जुड़ी मौसमी परिस्थितियां, सामान्य से कम वर्षा और जमाखोरी को प्रमुख कारण माना जा रहा है। बाजार में उपलब्ध आपूर्ति कम होने से कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बना है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मौसम और आपूर्ति की स्थिति में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई का असर और व्यापक हो सकता है।
तांबे की वैश्विक कीमतों में भी रिकॉर्ड उछाल
इधर, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तांबे की कीमतें भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। लंदन मेटल एक्सचेंज में तीन महीने का वायदा अनुबंध 13,842 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गया। चिली में बाढ़, शीतकालीन तूफान और भारी बर्फबारी के कारण प्रमुख खदानों में उत्पादन प्रभावित हुआ है। साथ ही डाटा सेंटर और पावर ग्रिड परियोजनाओं से बढ़ती मांग ने भी कीमतों को सहारा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर आने वाले समय में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, वाहनों और घरेलू उपयोग के कई उत्पादों की लागत पर पड़ सकता है।