Divorce Case – शादी के सात दिन बाद आपसी सहमति से कोर्ट ने दी तलाक की मंजूरी
Divorce Case – इंदौर के परिवार न्यायालय में एक ऐसा मामला सामने आया, जिसमें विवाह के केवल सात दिन बाद पति-पत्नी को आपसी सहमति से तलाक की मंजूरी मिल गई। सामान्य परिस्थितियों में हिंदू विवाह अधिनियम के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए एक निश्चित अवधि तक अलग रहने की शर्त होती है, लेकिन इस मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय सुनाया।

कानूनी प्रावधान के तहत की गई सुनवाई
मामले की सुनवाई के दौरान यह प्रश्न उठा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के अंतर्गत निर्धारित अवधि पूरी नहीं होने के कारण याचिका स्वीकार की जा सकती है या नहीं। इस पर याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने धारा 14(2) का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि विवाह का वास्तविक वैवाहिक जीवन शुरू ही नहीं हुआ हो और दोनों पक्ष साथ नहीं रहना चाहते हों, तो उन्हें जबरन वैवाहिक संबंध निभाने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।
दोनों पक्षों ने साथ रहने से किया इनकार
अदालत में प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, विवाह के बाद पत्नी ने पति के साथ रहने से साफ इनकार कर दिया। उसने बताया कि यह विवाह उसकी इच्छा के विरुद्ध हुआ था और परिवार के दबाव में यह रिश्ता स्वीकार करना पड़ा। महिला ने यह भी कहा कि वह किसी अन्य व्यक्ति से प्रेम करती है और इस कारण वह इस वैवाहिक संबंध को आगे नहीं बढ़ाना चाहती।
पति ने भी जताई सहमति
पत्नी की बात सुनने के बाद पति ने भी वैवाहिक संबंध समाप्त करने पर सहमति जताई। दोनों पक्ष इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि साथ रहना उनके लिए संभव नहीं है। इसके बाद दोनों ने परिवार न्यायालय में आपसी सहमति से तलाक की संयुक्त याचिका दायर की। अदालत ने दोनों की सहमति, मामले की परिस्थितियों और प्रस्तुत कानूनी आधार को ध्यान में रखते हुए तलाक की अनुमति प्रदान कर दी।
अदालत ने परिस्थितियों को माना महत्वपूर्ण
मामले से जुड़े अधिवक्ता के अनुसार, पति और पत्नी दोनों ही वैवाहिक जीवन जारी रखने के इच्छुक नहीं थे। अदालत ने पाया कि जब दोनों पक्ष स्पष्ट रूप से अलग होना चाहते हैं और विवाह का वास्तविक निर्वहन नहीं हुआ है, तब उन्हें अनावश्यक रूप से लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में बांधकर रखना उचित नहीं होगा। इसी आधार पर परिवार न्यायालय ने कम समय में मामले का निपटारा किया।
यह फैसला विशेष परिस्थितियों में दिया गया है और इसका आधार मामले के तथ्य, दोनों पक्षों की सहमति तथा अदालत के समक्ष प्रस्तुत कानूनी प्रावधान रहे। प्रत्येक वैवाहिक विवाद का निर्णय उसके अलग-अलग तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है।