Maharashtra – नसरापुर फैसले के बाद कानून-व्यवस्था पर ठाकरे गुट ने उठाए सवाल
Maharashtra – महाराष्ट्र के नसरापुर नाबालिग हमले और हत्या मामले में विशेष अदालत द्वारा मुख्य आरोपी को सुनाई गई मौत की सजा के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए इसे पीड़ित परिवार के लिए न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। साथ ही पार्टी ने कहा कि इस फैसले के बावजूद राज्य में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े बड़े सवाल अब भी बने हुए हैं।

‘सामना’ के संपादकीय में उठाए गए मुद्दे
पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि अदालत का फैसला पीड़ित परिवार को कुछ हद तक राहत जरूर देता है, लेकिन इससे कानून-व्यवस्था से जुड़ी व्यापक चुनौतियां समाप्त नहीं होतीं। संपादकीय में उल्लेख किया गया कि मामले का अपेक्षाकृत कम समय में निपटारा होना न्यायिक प्रक्रिया की गति को दर्शाता है, हालांकि इससे यह सुनिश्चित नहीं हो जाता कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों में स्वतः कमी आ जाएगी।
राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी
संपादकीय में राज्य सरकार की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाए गए हैं। ठाकरे गुट ने आरोप लगाया कि प्रशासन विभिन्न राजनीतिक और अन्य मुद्दों में व्यस्त है, जबकि नागरिकों की सुरक्षा पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा। लेख में यह भी दावा किया गया कि राज्य के कई हिस्सों में सामने आई आपराधिक घटनाएं कानून-व्यवस्था की स्थिति पर चिंता बढ़ाती हैं। हालांकि इन आरोपों पर सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया का भी इंतजार है।
महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जताई चिंता
संपादकीय में महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। इसमें कहा गया कि पुणे और नागपुर जैसे शहरों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ाई है। लेख में मुंबई की लोकल ट्रेनों में यात्रियों की सुरक्षा का भी उल्लेख करते हुए कहा गया कि सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा को और मजबूत किए जाने की आवश्यकता है। पार्टी का कहना है कि कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ महिलाओं की शारीरिक सुरक्षा सुनिश्चित करना भी सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
लंबित विधेयक और अपराध के आंकड़ों का जिक्र
संपादकीय में वर्ष 2020 में महा विकास अघाड़ी सरकार द्वारा पारित महाराष्ट्र शक्ति आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक का उल्लेख करते हुए कहा गया कि यह विधेयक अब भी लंबित है। साथ ही हाल के वर्षों में नाबालिगों के खिलाफ हिंसा और हत्या के मामलों का हवाला देते हुए अपराध नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता बताई गई। संपादकीय में कहा गया कि केवल न्यायिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है और अपराधों की रोकथाम के लिए प्रशासनिक स्तर पर भी ठोस प्रयास जरूरी हैं।
जवाबदेही को लेकर उठे सवाल
लेख के अंत में कहा गया कि अदालत ने अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए मामले में समयबद्ध फैसला दिया, लेकिन राज्य की कानून-व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सरकार की है। संपादकीय में यह भी कहा गया कि गृह विभाग का दायित्व संभाल रही राज्य सरकार को सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर जनता के सामने स्पष्ट जवाब देना चाहिए। इस बीच, मामले को लेकर राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है।