बिज़नेस

PharmaCrisis – पश्चिम एशिया तनाव से सस्ती दवाओं की सप्लाई पर मंडराया खतरा

PharmaCrisis – पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान टकराव का असर अब वैश्विक दवा बाजार पर भी दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे तो भारत के दवा उद्योग को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसका असर आम लोगों तक पहुंचने वाली जरूरी दवाओं की उपलब्धता और कीमतों पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

भारतीय दवा उद्योग पर बढ़ता दबाव

भारत दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादकों में शामिल है और कई देशों को सस्ती दवाओं की आपूर्ति करता है। लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात ने इस उद्योग की निर्भरता और कमजोरियों को उजागर कर दिया है। दवा कंपनियों से जुड़े संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बनी रही तो दवा निर्माण के लिए जरूरी कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, दवा उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर है। भारत बड़ी मात्रा में सक्रिय औषधि तत्व यानी एपीआई का आयात करता है और इसमें चीन की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। समुद्री मार्गों में बाधा आने से इन जरूरी सामग्रियों की आपूर्ति धीमी पड़ सकती है।

आम इस्तेमाल की दवाओं पर असर संभव

स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि सबसे पहले असर उन दवाओं पर दिख सकता है जिनका उपयोग रोजमर्रा की बीमारियों में किया जाता है। पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स, ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की दवाओं की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

इन दवाओं का उत्पादन बड़े स्तर पर आयातित कच्चे माल पर निर्भर करता है। यदि समय पर सप्लाई नहीं पहुंची तो उत्पादन लागत बढ़ेगी और बाजार में दवाओं की कीमतों में तेजी आ सकती है। कई कंपनियां पहले से वैकल्पिक सप्लाई चैन तलाशने में जुटी हैं।

माल ढुलाई खर्च बढ़ने से चिंता

दवा उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि युद्ध और सुरक्षा संबंधी जोखिमों के कारण समुद्री परिवहन महंगा होता जा रहा है। कई जहाजों को अब लंबे और सुरक्षित मार्गों से भेजा जा रहा है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ रहे हैं।

विशेष रूप से तापमान नियंत्रित दवाओं और इंजेक्शन की ढुलाई पर इसका ज्यादा असर पड़ सकता है। कैंसर और गंभीर बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं को सुरक्षित रखने के लिए विशेष लॉजिस्टिक व्यवस्था की जरूरत होती है। ऐसे में अतिरिक्त खर्च का बोझ अंततः मरीजों तक पहुंच सकता है।

वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था पर असर

भारत से सस्ती जेनेरिक दवाएं लेने वाले कई विकासशील देश इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देशों की स्वास्थ्य व्यवस्था भारतीय दवाओं पर निर्भर है। यदि भारतीय सप्लाई प्रभावित हुई तो इन देशों में दवा संकट गहरा सकता है।

वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारतीय दवा उद्योग का आकार करीब 50 अरब डॉलर का है और वैश्विक जेनेरिक दवा बाजार में उसकी मजबूत हिस्सेदारी है। ऐसे में उद्योग विशेषज्ञ सरकार से सप्लाई चेन को सुरक्षित करने और कच्चे माल के वैकल्पिक स्रोत विकसित करने की मांग कर रहे हैं।

सरकार और कंपनियां कर रहीं निगरानी

फार्मा कंपनियां हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। उद्योग संगठनों ने सरकार से समुद्री व्यापार और आयात व्यवस्था को लेकर विशेष रणनीति बनाने की अपील की है। साथ ही घरेलू स्तर पर एपीआई उत्पादन बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है ताकि भविष्य में बाहरी निर्भरता कम की जा सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button

Adblock Detected

Please disable your AdBlocker first, and then you can watch everything easily.