MohanBhagwat – वैश्विक तनाव पर बोले संघ प्रमुख, सोच बदलने पर जोर
MohanBhagwat – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने दुनिया में बढ़ते तनाव और संघर्षों को लेकर चिंता जताई है। नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर शांति की कमी के पीछे सबसे बड़ा कारण इंसानी सोच और स्वार्थ की प्रवृत्ति है। उनके अनुसार, जब तक लोग दूसरों पर प्रभुत्व जमाने की मानसिकता से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक स्थायी शांति स्थापित करना मुश्किल रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि भारत की पारंपरिक सोच और जीवन दर्शन में इन समस्याओं का समाधान छिपा हुआ है।

स्वार्थ और वर्चस्व की भावना पर उठाए सवाल
अपने संबोधन में भागवत ने स्पष्ट किया कि दुनिया में चल रहे अधिकांश विवादों की जड़ लोगों की स्वार्थपूर्ण सोच और दूसरों को नियंत्रित करने की इच्छा है। उन्होंने कहा कि यह प्रवृत्ति समाज में असंतुलन पैदा करती है और संघर्ष को जन्म देती है। पिछले कई दशकों में शांति स्थापित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए, लेकिन वे अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके। उनका मानना है कि जब तक व्यक्ति अपने भीतर झांककर बदलाव नहीं करेगा, तब तक बाहरी प्रयास सीमित ही रहेंगे।
धार्मिक कट्टरता और सामाजिक विभाजन पर चिंता
संघ प्रमुख ने यह भी कहा कि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में धार्मिक असहिष्णुता और जबरन परिवर्तन जैसी समस्याएं मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि जब लोग खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को कमतर समझते हैं, तो समाज में दूरी और टकराव बढ़ता है। इस मानसिकता के कारण ही अलग-अलग समुदायों के बीच विश्वास की कमी बनी रहती है, जो अंततः बड़े विवादों का रूप ले लेती है।
आचरण में दिखना चाहिए धर्म का स्वरूप
भागवत ने जोर देकर कहा कि धर्म केवल सिद्धांतों या ग्रंथों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह लोगों के व्यवहार में नजर आना चाहिए। उन्होंने कहा कि सच्चा धर्म वही है जो व्यक्ति के आचरण, अनुशासन और नैतिक मूल्यों में झलकता है। इसके लिए निरंतर प्रयास, समर्पण और त्याग की आवश्यकता होती है। अगर समाज में अनुशासन और नैतिकता को महत्व नहीं दिया जाएगा, तो शांति और संतुलन की कल्पना अधूरी ही रह जाएगी।
भारत की सोच को बताया समाधान
उन्होंने भारत के प्राचीन ज्ञान और संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां हमेशा से पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखने की परंपरा रही है। यह विचारधारा लोगों को जोड़ने का काम करती है, न कि विभाजन पैदा करने का। भागवत के अनुसार, आज के समय में जब दुनिया कई तरह के संकटों से जूझ रही है, तब इस दृष्टिकोण की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।
टकराव नहीं, सहयोग की जरूरत
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि दुनिया को अब टकराव और प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़कर सहयोग और समन्वय की दिशा में काम करना चाहिए। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आधुनिक विज्ञान भी धीरे-धीरे इस बात को स्वीकार कर रहा है कि सभी जीव और तत्व आपस में जुड़े हुए हैं। ऐसे में मानव समाज को भी आपसी समझ और सहयोग को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि एक संतुलित और शांतिपूर्ण विश्व की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकें।