उत्तराखण्ड

WildlifeConflict – पौड़ी में बढ़ते वन्यजीवों के हमलों से लोगों में फैली गहरी चिंता

WildlifeConflict – गढ़वाल क्षेत्र के पौड़ी जिले में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संघर्ष अब गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। हालात ऐसे हैं कि कई ग्रामीण इलाकों में बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। लगातार बढ़ रहे हमलों के बीच स्थानीय लोग भय के माहौल में जीवन बिताने को मजबूर हैं। वन विभाग पर यह सवाल भी उठ रहे हैं कि वन्यजीवों की संख्या बढ़ने के बावजूद संसाधनों और कर्मचारियों की व्यवस्था समय के अनुसार क्यों नहीं बढ़ाई गई।

तीन वर्षों में तेजी से बढ़े हमले

वन विभाग के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को साफ दर्शाते हैं। वर्ष 2023 से 2025 के बीच गढ़वाल वन प्रभाग में वन्यजीव हमलों की कुल 246 घटनाएं दर्ज की गईं। इन घटनाओं में 14 लोगों की जान गई जबकि 232 लोग घायल हुए। केवल वर्ष 2025 में ही 116 मामले सामने आए, जो प्रदेश में सबसे अधिक बताए जा रहे हैं। जनवरी 2026 से मार्च मध्य तक भी 16 घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं। वन्यजीवों से फसल, पशुधन और मकानों को होने वाले नुकसान के आंकड़े इससे अलग हैं।

स्टाफ की कमी बनी बड़ी चुनौती

मानव-वन्यजीव संघर्ष से जूझ रहे इस वन प्रभाग में कर्मचारियों की भारी कमी भी सामने आई है। स्वीकृत पदों के मुकाबले कई महत्वपूर्ण पद वर्षों से खाली पड़े हैं। रेंजर से लेकर वन आरक्षी तक की कमी के कारण निगरानी और त्वरित कार्रवाई प्रभावित हो रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं लेकिन फील्ड स्तर पर वन विभाग की मौजूदगी सीमित दिखाई देती है।

रेस्क्यू सेंटर तक नहीं बन पाया

स्थिति की गंभीरता के बावजूद पूरे गढ़वाल क्षेत्र में अब तक कोई स्थायी रेस्क्यू या ट्रांजिट सेंटर तैयार नहीं हो पाया है। खतरनाक वन्यजीवों को पकड़ने के बाद उन्हें रखने के लिए उचित व्यवस्था नहीं होने से विभाग को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। वन विभाग के पास सीमित संसाधन हैं। पूरे वन प्रभाग में केवल 12 बंदूकें और पांच ट्रैंक्यूलाइजर गन उपलब्ध हैं। वहीं तेंदुए, बाघ और भालू को पकड़ने के लिए कुछ ही पिंजरे मौजूद हैं।

ग्रामीण इलाकों में लगातार बढ़ रहा डर

पौड़ी जिले के कई गांवों में लोग वन्यजीवों के डर के बीच रह रहे हैं। स्थानीय निवासी बताते हैं कि पहले जिन इलाकों में बंदर या गुलदार कम दिखाई देते थे, वहां अब इनकी गतिविधियां लगातार बढ़ गई हैं। कुछ गांवों में लोगों ने घरों की सुरक्षा के लिए लोहे की जालियां तक लगानी शुरू कर दी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि शाम ढलने के बाद बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। कई जगह भालू और तेंदुए के हमलों की घटनाएं भी सामने आई हैं।

वैज्ञानिक अध्ययन की कमी पर सवाल

विशेषज्ञों का कहना है कि अब तक इस बात का वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया कि जंगलों की वास्तविक धारण क्षमता कितनी है और वन्यजीवों की संख्या किस स्तर तक पहुंच चुकी है। बदलते पर्यावरण और मानव बस्तियों के विस्तार के कारण वन्यजीव आबादी और इंसानी क्षेत्रों के बीच दूरी कम हो रही है। इसके बावजूद दीर्घकालिक रणनीति की कमी महसूस की जा रही है।

विभाग ने संसाधन बढ़ाने की बात कही

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष टीमें तैनात की गई हैं और खतरनाक वन्यजीवों को पकड़ने की कार्रवाई जारी है। विभाग ने यह भी बताया कि एक रेस्क्यू सेंटर स्थापित करने की योजना पर काम चल रहा है। बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए कई इलाकों में एस्कोर्ट व्यवस्था भी लागू की गई है।

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