ForestFire – पौड़ी में बढ़ती वनाग्नि से जंगल और संसाधनों पर पड़ा दबाव
ForestFire – उत्तराखंड में जंगलों में लगने वाली आग लगातार बड़ी चुनौती बनी हुई है और पौड़ी जिला इससे सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हो गया है। वन विभाग की तैयारियों और संसाधन बढ़ाने के दावों के बावजूद बीते कुछ वर्षों में जिले में वनाग्नि की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालात यह हैं कि राज्य में सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों की सूची में पौड़ी लगातार ऊपरी स्थानों पर बना हुआ है।

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 और 2025 में पौड़ी जिला वनाग्नि की घटनाओं के मामले में प्रदेश में दूसरे स्थान पर रहा। लगातार लग रही आग से जंगलों की जैव विविधता और पर्यावरण दोनों प्रभावित हुए हैं।
तीन वर्षों में सैकड़ों घटनाएं दर्ज
आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2023 से 2025 के बीच पौड़ी जिले में वनाग्नि की कुल 325 घटनाएं दर्ज की गईं। इन घटनाओं में करीब 425 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार आग लगने से जंगलों की प्राकृतिक संरचना और वन्य जीवन पर भी असर पड़ रहा है।
वन विभाग के अनुसार, सिविल सोयम पौड़ी वन प्रभाग, गढ़वाल वन प्रभाग और नागदेव रेंज सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल हैं। इस वर्ष फायर सीजन शुरू होने के बाद भी कई स्थानों पर आग की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
अधिकारियों के मुताबिक, फरवरी के बाद से अब तक सिविल सोयम क्षेत्र में कई घटनाओं में करीब 11 हेक्टेयर और गढ़वाल वन प्रभाग में 21 हेक्टेयर जंगल प्रभावित हुआ है।
संसाधनों और कर्मचारियों की कमी
वनाग्नि नियंत्रण के लिए हर वर्ष 15 फरवरी से 15 जून तक विशेष फायर सीजन घोषित किया जाता है। इस दौरान फायर लाइन की सफाई, कंट्रोल बर्निंग और निगरानी जैसे कार्य किए जाते हैं। हालांकि जमीनी स्तर पर संसाधनों की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
सिविल सोयम वन प्रभाग की कई रेंज में नियमित रेंजरों की जगह डिप्टी रेंजर काम संभाल रहे हैं। इसके अलावा वन आरक्षियों के कई पद खाली पड़े हैं। कुछ क्षेत्रों में विभाग के पास पर्याप्त वाहन भी उपलब्ध नहीं हैं, जिसके कारण फायर सीजन के दौरान किराये के वाहनों का सहारा लेना पड़ता है।
वन विभाग ने हाल के वर्षों में मॉडल क्रू स्टेशन, लीफ ब्लोअर और अन्य उपकरण उपलब्ध कराने की बात कही है, लेकिन कर्मचारियों की कमी अब भी समस्या बनी हुई है।
पिरुल बना आग फैलने का बड़ा कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, चीड़ के जंगलों में गिरने वाली सूखी पत्तियां यानी पिरुल आग फैलने का एक प्रमुख कारण हैं। गर्मी और सूखे मौसम में ये पत्तियां तेजी से आग पकड़ लेती हैं।
वन विभाग ने पिरुल एकत्र करने और उसके बदले भुगतान की योजना शुरू की है। इसके तहत स्थानीय लोगों और स्वयं सहायता समूहों को पिरुल इकट्ठा करने पर भुगतान दिया जा रहा है। विभाग का कहना है कि इसका उपयोग चेक डैम और ब्रिकेट निर्माण जैसे कार्यों में किया जाएगा।
हालांकि कई इलाकों में अब भी बड़ी मात्रा में पिरुल जंगलों में जमा दिखाई दे रहा है, जिससे आग का खतरा लगातार बना हुआ है।
मानवजनित कारणों पर भी चिंता
वन अधिकारियों का कहना है कि जंगल की आग केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं लगती, बल्कि कई मामलों में मानव लापरवाही भी बड़ी वजह बनती है। खेत साफ करने के लिए लगाई गई आग कई बार जंगल तक पहुंच जाती है। कुछ मामलों में जानबूझकर आग लगाने की घटनाएं भी सामने आती हैं।
वन विभाग ने लोगों से सतर्कता बरतने और जंगलों के आसपास आग का उपयोग न करने की अपील की है। विभाग के अनुसार, इस वर्ष फायर वॉचर की तैनाती बढ़ाई गई है और कई नए संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं ताकि आग पर जल्द नियंत्रण पाया जा सके।