Mayawati BSP Political Crisis: क्या खत्म हो जाएगा मायावती का सियासी साम्राज्य, संसद में बंद होगी बसपा की आवाज…
Mayawati BSP Political Crisis: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। एक समय था जब मायावती के एक इशारे पर दिल्ली की सत्ता हिल जाती थी, लेकिन आज हालात यह हैं कि विधानसभा से लेकर संसद तक बसपा का आधार (Mayawati BSP Political Crisis) लगातार सिमटता जा रहा है। यूपी विधानसभा में पार्टी का सिर्फ एक विधायक बचा है, जबकि विधान परिषद पहले ही बसपा मुक्त हो चुकी है। अब सबसे बड़ा झटका 2026 में लगने वाला है, जब राज्यसभा से भी बसपा का सूपड़ा साफ हो जाएगा।

राज्यसभा से रामजी गौतम की विदाई और शून्य होता प्रतिनिधित्व
संसद में बसपा की अंतिम उम्मीद अब सिर्फ एक सदस्य पर टिकी है। वर्तमान में बसपा के पास लोकसभा में कोई सीट नहीं है और राज्यसभा में केवल (BSP Rajya Sabha Member Ramji Gautam) रामजी गौतम पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। गौरतलब है कि रामजी गौतम का कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त होने जा रहा है। उनके रिटायर होते ही साढ़े तीन दशक के इतिहास में यह पहली बार होगा, जब देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद के दोनों सदनों में बसपा का एक भी सदस्य मौजूद नहीं होगा।
यूपी का सियासी गणित और बसपा की डगमगाती राह
उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर नवंबर 2026 में चुनाव होने हैं, लेकिन बसपा के लिए डगर बहुत कठिन है। आंकड़ों के खेल को समझें तो एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए (UP Rajya Sabha Election 2026) कम से कम 37 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। बसपा के पास वर्तमान में केवल एक विधायक है, जो नामांकन दाखिल करने के लिए भी पर्याप्त नहीं है। ऐसे में जब तक 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी चमत्कारिक प्रदर्शन नहीं करती, तब तक संसद के उच्च सदन में उसकी वापसी नामुमकिन नजर आती है।
1989 से अब तक: पहली बार खामोश होगी नीली दहाड़
बसपा का संसदीय इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। 1984 में मान्यवर कांशीराम द्वारा पार्टी गठन के बाद, 1989 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने पहली बार तीन सीटें जीतकर अपनी धमक दिखाई थी। स्वयं मायावती (Mayawati Political Career History) बिजनौर से जीतकर संसद पहुंची थीं। 1994 में पहली बार मायावती राज्यसभा सदस्य बनीं और तब से लेकर आज तक संसद में हमेशा बसपा की आवाज गूंजती रही है। लेकिन 2026 का साल इस ऐतिहासिक सिलसिले पर पूर्ण विराम लगा सकता है, जो समर्थकों के लिए एक भावनात्मक झटका है।
राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खोने की लटकती तलवार
चुनावी हार के साथ-साथ बसपा के सामने अब अपनी पहचान बचाने का भी संकट है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर गिरकर महज 2.04 प्रतिशत रह गया है। चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, (National Party Status Criteria) राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बनाए रखने के लिए कुछ खास शर्तों को पूरा करना अनिवार्य होता है। बसपा फिलहाल इन मानकों पर खरी नहीं उतर रही है। अगर निर्वाचन आयोग कड़ा रुख अपनाता है, तो बसपा से ‘राष्ट्रीय पार्टी’ का तमगा छिन सकता है, जो मायावती के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक क्षति होगी।
2027 का विधानसभा चुनाव: बसपा के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति
अब पार्टी की पूरी उम्मीदें 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बसपा इस चुनाव में कम से कम 40 सीटें नहीं जीत पाती, तो (BSP Mission 2027 UP Election) 2029 तक संसद में उसका प्रतिनिधित्व शून्य ही बना रहेगा। मायावती ने हाल ही में अपने भतीजे आकाश आनंद को दोबारा सक्रिय किया है और ‘नीली टोपी’ जैसे नए प्रयोग शुरू किए हैं, ताकि दलित और मुस्लिम समीकरणों को फिर से साधा जा सके।
क्या दलित राजनीति का नया चेहरा बनेंगे चंद्रशेखर?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो कभी बसपा का अभेद्य किला माना जाता था, वहां अब समीकरण बदल रहे हैं। नगीना सीट से चंद्रशेखर आजाद की जीत ने बसपा के वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी की है। (Azad Samaj Party vs BSP) चंद्रशेखर की बढ़ती लोकप्रियता मायावती के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। मुजफ्फरनगर से मिशन 2027 का आगाज कर चंद्रशेखर ने साफ कर दिया है कि वे बसपा के कमजोर होते आधार को कब्जाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
निष्कर्ष: संघर्ष के दौर में बहुजन राजनीति
बसपा इस समय अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। कांशीराम के संघर्षों से खड़ी हुई यह पार्टी आज नेतृत्व और जनाधार के संकट से जूझ रही है। संसद में आवाज का खामोश होना सिर्फ एक पार्टी की हार नहीं, बल्कि उस (Dalit Politics in India) बड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व का संकट है जो दशकों से मायावती को अपनी ताकत मानता आया है। क्या मायावती 2027 में कोई मास्टरस्ट्रोक खेल पाएंगी या बसपा का यह अवसान जारी रहेगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।



