HighCourt – नाबालिग से दुष्कर्म मामले में सौतेले पिता को जमानत नहीं…
HighCourt– केरल उच्च न्यायालय ने नाबालिग सौतेली बेटी से कथित दुष्कर्म के आरोपी व्यक्ति की जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने मामले की गंभीरता और उपलब्ध प्रारंभिक सामग्री का उल्लेख करते हुए कहा कि इस चरण में आरोपी को राहत देने का कोई आधार नहीं बनता। न्यायालय ने माना कि आरोप अत्यंत गंभीर प्रकृति के हैं और मामले की जांच अभी जारी है।

अदालत ने आरोपों की गंभीरता पर जताई चिंता
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने केस डायरी का अवलोकन किया। अदालत के अनुसार, शुरुआती जांच में सामने आए तथ्यों से प्रथम दृष्टया यह संकेत मिलता है कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर हैं। न्यायालय ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में उपलब्ध सामग्री के आधार पर घटना कथित रूप से पूर्व नियोजित प्रतीत होती है। हालांकि, आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी।
अभियोजन पक्ष ने अदालत के सामने रखा पक्ष
अभियोजन के अनुसार, आरोपी मूल रूप से पश्चिम बंगाल का रहने वाला है और उस पर आरोप है कि उसने अपनी 14 वर्षीय सौतेली बेटी के साथ उस समय कथित यौन उत्पीड़न किया, जब बच्ची की मां अपने पैतृक घर गई हुई थी। अभियोजन ने अदालत को बताया कि पीड़िता के साथ कथित रूप से एक से अधिक बार यौन उत्पीड़न किया गया, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई। इन तथ्यों को आधार बनाते हुए अभियोजन ने जमानत का विरोध किया।
बचाव पक्ष ने आरोपों को बताया निराधार
आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि उनके मुवक्किल को झूठे मामले में फंसाया गया है और उन्हें जमानत दी जानी चाहिए। बचाव पक्ष ने आरोपों से इनकार करते हुए अदालत से राहत की मांग की। हालांकि, दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद न्यायालय ने जमानत देने से इनकार कर दिया।
इस स्तर पर राहत देने से अदालत का इनकार
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि मामले में आरोपों की प्रकृति, अपराध की गंभीरता, आरोपी की कथित भूमिका और जांच से जुड़े उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए इस समय जमानत देना उचित नहीं होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो, इसके लिए आरोपी को फिलहाल हिरासत में रहना आवश्यक है। इसी आधार पर जमानत याचिका खारिज कर दी गई।
मामला न्यायिक प्रक्रिया में जारी
यह मामला अभी न्यायिक विचाराधीन है और अंतिम निर्णय सुनवाई पूरी होने के बाद ही आएगा। भारतीय न्याय व्यवस्था के अनुसार, किसी भी आरोपी को अदालत द्वारा दोषी सिद्ध किए जाने तक निर्दोष माना जाता है। मामले की आगे की सुनवाई और जांच के आधार पर आगामी कानूनी कार्रवाई तय होगी।