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राष्ट्रीय

FCRAAmendment – सतीशन का आरोप, केंद्र की नीतियां ईसाई संस्थाओं के लिए चिंताजनक

FCRAAmendment – केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उनके कदमों में विरोधाभास साफ नजर आता है। शनिवार को कासरगोड में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि एक ओर बीजेपी त्योहारों के दौरान चर्च और धार्मिक नेताओं से मेलजोल बढ़ाने की कोशिश करती है, वहीं दूसरी ओर ऐसी नीतियां लाती है जो अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर ईसाई संस्थाओं को प्रभावित कर सकती हैं।

FCRA संशोधन को लेकर उठाए सवाल

सतीशन ने प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम यानी एफसीआरए में बदलाव को लेकर गहरी चिंता जताई। उनके अनुसार, इन संशोधनों से केंद्र सरकार को अत्यधिक अधिकार मिल जाएंगे, जिससे किसी भी विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्था का लाइसेंस बिना स्पष्ट कारण बताए रद्द या नवीनीकरण से रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे कई सामाजिक व धार्मिक संस्थाओं के कामकाज पर असर पड़ सकता है।

संपत्तियों पर नियंत्रण का भी आरोप

विपक्ष के नेता ने यह भी आरोप लगाया कि यदि किसी संस्था का लाइसेंस नवीनीकृत नहीं किया जाता है, तो सरकार उसके संसाधनों और संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित कर सकती है। उन्होंने इसे बेहद गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा कि इससे उन संस्थाओं की स्वतंत्रता प्रभावित होगी, जो लंबे समय से समाज सेवा और कल्याण के कार्यों में लगी हुई हैं। उनके मुताबिक, यह स्थिति नागरिक समाज के लिए असहज माहौल पैदा कर सकती है।

बीजेपी की नीतियों पर दोहरे रवैये का आरोप

सतीशन ने बीजेपी के रवैये को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि पार्टी सार्वजनिक रूप से सद्भाव और संवाद की बात करती है, लेकिन नीतिगत फैसलों में अलग तस्वीर नजर आती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि त्योहारों के दौरान धार्मिक स्थलों पर जाकर सद्भावना दिखाना और दूसरी तरफ ऐसे कानून लाना, जो उन्हीं समुदायों को प्रभावित करें, यह विरोधाभासी रुख है।

केंद्रीय मंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया

इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी के हालिया बयान पर भी सतीशन ने प्रतिक्रिया दी। गोपी ने कहा था कि प्रस्तावित संशोधन किसी विशेष धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करते, बल्कि देशहित और संपत्तियों की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। इस पर सतीशन ने उन्हें सुझाव दिया कि वे विधेयक के प्रावधानों को विस्तार से समझें और उसके संभावित प्रभावों पर पुनर्विचार करें।

राजनीतिक बहस तेज होने के संकेत

इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में इस मुद्दे को लेकर बहस और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं। विपक्ष जहां इसे अल्पसंख्यक संस्थाओं के लिए खतरा बता रहा है, वहीं सत्ताधारी पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता से जोड़कर देख रहा है। आने वाले दिनों में यह विषय राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बना रह सकता है।

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