Archaeology – रायबरेली में सुरंग की चर्चा के बीच मिले कुषाणकालीन बसावट के संकेत
Archaeology – उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के हरचंदपुर क्षेत्र स्थित ओई भीट गांव में कथित सुरंग मिलने की चर्चाओं के बीच पुरातत्व विभाग की शुरुआती जांच ने मामले की दिशा बदल दी है। विभाग की टीम के अनुसार, अब तक के निरीक्षण में किसी सुरंग के प्रमाण नहीं मिले हैं। इसके बजाय मौके से ऐसे अवशेष मिले हैं, जो लगभग 2000 वर्ष पुराने कुषाणकालीन कालखंड से जुड़े हो सकते हैं। अधिकारियों का कहना है कि प्रारंभिक साक्ष्य किसी विकसित प्राचीन बसावट की ओर संकेत करते हैं।

बारिश के बाद सामने आया था मामला
करीब एक सप्ताह पहले हुई भारी बारिश के बाद गांव के किसान सुशील मौर्या के खेत में जमीन धंस गई थी। जब उन्होंने मौके का निरीक्षण किया तो नीचे पक्की ईंटों से बनी एक दीवार जैसी संरचना दिखाई दी। इसकी जानकारी फैलते ही स्थानीय लोगों के बीच सुरंग मिलने की चर्चा शुरू हो गई। सूचना मिलने पर पुरातत्व विभाग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए विशेषज्ञों की टीम को मौके पर भेजा और स्थल का विस्तृत निरीक्षण कराया।
प्रारंभिक जांच में मिले प्राचीन अवशेष
लखनऊ से पहुंची पुरातत्व विभाग की टीम ने स्थल का निरीक्षण करने के दौरान मिट्टी के बर्तन और अन्य प्राचीन सामग्री बरामद की। सहायक पुरातत्व अधिकारी डॉ. मनोज कुमार यादव ने बताया कि प्रारंभिक अध्ययन के आधार पर ये अवशेष करीब दो हजार वर्ष पुराने प्रतीत होते हैं और इनका संबंध कुषाणकाल से हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अभी तक ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है जिससे यह साबित हो कि वहां कोई सुरंग मौजूद है। उनके अनुसार, मोटी ईंटों की दीवारें और अन्य संरचनाएं किसी प्राचीन नगरीय बसावट की संभावना को मजबूत करती हैं।
विस्तृत सर्वेक्षण से खुल सकते हैं नए तथ्य
पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य सरकार वैज्ञानिक तरीके से विस्तृत सर्वेक्षण एवं उत्खनन कराते हैं, तो इस क्षेत्र से महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी सामने आ सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि यहां कभी कोई विकसित नगर या प्राचीन आबादी मौजूद थी। ऐसे निष्कर्ष मिलने पर ओई भीट उत्तर भारत के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों में अपनी पहचान बना सकता है।
पहले भी मिल चुके हैं ऐतिहासिक संकेत
खेत के मालिक सुशील मौर्या ने बताया कि वर्ष 1995-96 और 1996-97 के दौरान भी इस क्षेत्र से प्राचीन अवशेष मिलने के बाद पुरातत्व विभाग ने सर्वेक्षण किया था। हालांकि, उस समय जांच आगे नहीं बढ़ सकी। उनका दावा है कि संबंधित भूमि का उल्लेख राजस्व अभिलेखों में भी दर्ज है। उनका मानना है कि यदि समय रहते व्यवस्थित खुदाई कराई जाती, तो इस क्षेत्र के इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य पहले ही सामने आ सकते थे।
ग्रामीणों ने उत्खनन की उठाई मांग
गांव के पूर्व प्रधान हरिश्चंद्र मौर्य, प्रधान प्रतिनिधि और अन्य ग्रामीणों ने सरकार से पूरे क्षेत्र का वैज्ञानिक उत्खनन कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि विशेषज्ञों की निगरानी में व्यवस्थित खुदाई होती है, तो क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित किया जा सकेगा और इससे स्थानीय स्तर पर भी ऐतिहासिक महत्व बढ़ेगा। फिलहाल पुरातत्व विभाग प्रारंभिक जांच के निष्कर्षों के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय करने की तैयारी में है।