PrisonStaff – झारखंड की जेलों में कर्मचारियों की कमी से बढ़ी चुनौतियां
PrisonStaff – झारखंड की जेल व्यवस्था इस समय गंभीर मानव संसाधन संकट का सामना कर रही है। राज्य की विभिन्न जेलों में बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं, जिससे सुरक्षा व्यवस्था से लेकर कैदियों के पुनर्वास कार्यक्रम तक प्रभावित हो रहे हैं। हाल ही में जारी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की ‘प्रिजन स्टैटिस्टिक्स ऑफ इंडिया 2024’ रिपोर्ट में यह स्थिति स्पष्ट रूप से सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य की जेलों में स्वीकृत पदों का बड़ा हिस्सा अब भी रिक्त है, जिससे प्रशासनिक दबाव लगातार बढ़ रहा है।

राज्य की जेलों में हजारों पद खाली
आंकड़ों के मुताबिक झारखंड की 32 जेलों में कुल 2,721 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 1,008 कर्मचारी ही कार्यरत हैं। इसका मतलब है कि करीब 1,713 पद खाली पड़े हैं। कर्मचारियों की इस कमी के कारण कई जेलों में एक व्यक्ति को एक साथ कई जिम्मेदारियां संभालनी पड़ रही हैं। जेल प्रशासन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि सीमित स्टाफ के कारण रोजमर्रा के संचालन में कठिनाइयां बढ़ती जा रही हैं।
राजधानी रांची स्थित बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। यहां कई चर्चित और हाई प्रोफाइल कैदी बंद हैं, लेकिन कर्मचारियों की कमी के चलते सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी सीमित संसाधनों के साथ निभाई जा रही है।
अधिकारियों पर बढ़ा अतिरिक्त दबाव
रिपोर्ट में बताया गया है कि जेल अधिकारियों पर भी काम का बोझ लगातार बढ़ रहा है। उपलब्ध कर्मचारियों के आधार पर देखा जाए तो औसतन एक अधिकारी को कई कैदियों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है। इससे निगरानी व्यवस्था के साथ-साथ प्रशासनिक कार्यों की गति भी प्रभावित हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जेलों में पर्याप्त स्टाफ नहीं होने से कैदियों के सुधार और पुनर्वास से जुड़े कार्यक्रमों को भी नुकसान पहुंचता है। जेल प्रशासन केवल सुरक्षा व्यवस्था तक सीमित होकर रह जाता है, जबकि सुधारात्मक गतिविधियां पीछे छूट जाती हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी कमजोर
जेलों में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य की जेलों में बंद 16 हजार से अधिक कैदियों के लिए केवल 81 मेडिकल कर्मचारी उपलब्ध हैं। ऐसे में बीमार कैदियों को समय पर इलाज उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो गया है। कई जेलों में नियमित स्वास्थ्य जांच और मानसिक स्वास्थ्य परामर्श जैसी सुविधाएं भी सीमित स्तर पर संचालित हो रही हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जेलों में भीड़ और सीमित चिकित्सा व्यवस्था के कारण संक्रमण और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। ऐसे में मेडिकल स्टाफ की नियुक्ति को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई जा रही है।
जेलर और सहायक जेलर के पदों पर भी असर
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि जेलर और सहायक जेलर के पदों पर भारी कमी बनी हुई है। राज्य में 29 स्वीकृत जेलर पदों में केवल 6 अधिकारी कार्यरत हैं। इसी तरह 67 सहायक जेलर पदों में भी सिर्फ 6 नियुक्तियां ही हैं। इससे प्रशासनिक फैसलों और निगरानी व्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है।
जेल विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि वरिष्ठ अधिकारियों की कमी होने से निचले स्तर के कर्मचारियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आ जाती है, जिससे कार्य क्षमता प्रभावित होती है।
हाईकोर्ट ने मांगी थी रिपोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट भी इस मुद्दे पर चिंता जता चुका है। अदालत ने राज्य सरकार से जेलों में रिक्त पदों और लंबित नियुक्तियों की स्थिति पर विस्तृत जानकारी मांगी थी। सरकार की ओर से बताया गया था कि वार्डन, सहायक जेलर और मेडिकल स्टाफ की भर्ती प्रक्रिया जारी है।
इसी बीच इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 में भी झारखंड की जेल व्यवस्था को कमजोर श्रेणी में रखा गया है। रिपोर्ट में कहा गया कि राज्य लंबे समय से उन क्षेत्रों में शामिल है जहां जेल विभाग में बड़ी संख्या में पद खाली हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते नियुक्तियां नहीं हुईं तो जेल प्रशासन के सामने आने वाली चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।