स्वास्थ्य

Diagnosis – साधारण ब्लड टेस्ट से शुरुआती चरण में जागी अल्जाइमर की पहचान की नई उम्मीद

Diagnosis – अल्जाइमर जैसी याददाश्त को प्रभावित करने वाली गंभीर बीमारी की शुरुआती पहचान अब भविष्य में केवल एक सामान्य ब्लड टेस्ट से संभव हो सकती है। वैज्ञानिकों ने ऐसी नई तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जिसके जरिए रक्त में मौजूद दिमाग से जुड़े विशेष आरएनए संकेतकों की पहचान कर बीमारी के शुरुआती लक्षणों का पता लगाया जा सकता है। यह अध्ययन नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है और विशेषज्ञ इसे न्यूरोलॉजी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति मान रहे हैं।

नई तकनीक से जांच हो सकती है आसान

शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि आगामी बड़े स्तर के क्लीनिकल परीक्षण सफल रहते हैं, तो अल्जाइमर की जांच के लिए महंगे ब्रेन स्कैन या रीढ़ की हड्डी से द्रव निकालने वाली जटिल प्रक्रिया की आवश्यकता काफी हद तक कम हो सकती है। इससे मरीजों के लिए जांच अधिक सुविधाजनक और कम खर्चीली बनने की संभावना है। फिलहाल इस तकनीक को व्यापक उपयोग से पहले कई वैज्ञानिक परीक्षणों से गुजरना होगा।

खून में मिले दिमाग से जुड़े अहम संकेत

अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने रक्त में मौजूद बेहद सूक्ष्म जैविक कणों का विश्लेषण किया। ये कण शरीर की कोशिकाओं से निकलते हैं और मस्तिष्क से संबंधित जानकारी भी रक्त तक पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं। शोध में एक नए प्रकार के सूक्ष्म कण की पहचान की गई, जिसे शोधकर्ताओं ने “सीकमर” नाम दिया है। यह कण मस्तिष्क की कोशिकाओं से निकलने वाले आरएनए को रक्त तक पहुंचाता है। इन्हीं आरएनए में ऐसे बदलाव मिले, जिन्हें अल्जाइमर से जुड़ी शुरुआती प्रक्रियाओं का संकेत माना जा रहा है।

मौजूदा जांच पद्धति से कैसे अलग है यह तरीका

वर्तमान समय में अल्जाइमर की पुष्टि के लिए आमतौर पर पीईटी स्कैन, अन्य उन्नत ब्रेन स्कैन या लंबर पंचर के माध्यम से स्पाइनल फ्लूड की जांच की जाती है। हाल के वर्षों में कुछ ब्लड टेस्ट भी विकसित हुए हैं, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य एमिलॉयड-बीटा और टाऊ जैसे प्रोटीन की जांच करना होता है। नई रिसर्च के अनुसार आरएनए में होने वाले बदलाव प्रोटीन बनने से पहले दिखाई दे सकते हैं। इससे बीमारी का संकेत अधिक प्रारंभिक अवस्था में मिलने की संभावना बढ़ जाती है, जब मस्तिष्क को अपेक्षाकृत कम नुकसान पहुंचा होता है।

बढ़ती मरीजों की संख्या के बीच महत्वपूर्ण शोध

अल्जाइमर डिमेंशिया का सबसे सामान्य रूप माना जाता है, जिसमें समय के साथ याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और दैनिक कार्य करने की योग्यता प्रभावित होने लगती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर में 5.5 करोड़ से अधिक लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह संख्या 15 करोड़ से अधिक हो सकती है। ऐसे में शुरुआती पहचान की दिशा में होने वाला हर वैज्ञानिक प्रयास स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए अहम माना जा रहा है।

आगे का लक्ष्य क्या है

शोधकर्ताओं के अनुसार अब उनका ध्यान कम लागत वाले पीसीआर आधारित ब्लड टेस्ट के विकास पर है। उद्देश्य ऐसा परीक्षण तैयार करना है, जिससे सामान्य रक्त जांच के जरिए आरएनए में होने वाले बदलावों की पहचान आसानी से की जा सके। यदि यह तकनीक भविष्य के परीक्षणों में सफल साबित होती है, तो अल्जाइमर की जांच पहले की तुलना में अधिक सुलभ, किफायती और व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराई जा सकती है।

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