Vinod Rathod Untold Story and Struggle: जिसने संजय दत्त को बनाया ‘खलनायक’, वही गायक क्यों गुमनामी के अंधेरे में खो गया…
Vinod Rathod Untold Story and Struggle: बॉलीवुड की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘खलनायक’ का जिक्र होते ही संजय दत्त का वह बेखौफ अंदाज आंखों के सामने तैर जाता है। लेकिन इस किरदार को अमर बनाने के पीछे जिस शख्स की जादुई आवाज थी, वह नाम है विनोद राठौड़। उन्होंने ‘नायक नहीं खलनायक हूं मैं’ जैसे गाने को अपनी रूह से सींचा, जिसने संजय दत्त को रातों-रात सुपरस्टार की कतार में खड़ा कर दिया। (Playback Singing) की दुनिया में विनोद राठौड़ का योगदान किसी भी दिग्गज से कम नहीं रहा है, फिर भी विडंबना देखिए कि जिस आवाज ने दूसरों को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाया, उसे खुद वह हक नहीं मिला जिसका वह हकदार था।

संगीत की विरासत और पिता के चरणों में मिली शिक्षा
विनोद राठौड़ का जन्म 12 सितंबर 1962 को एक ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ हवाओं में भी सुरों का वास था। उनके पिता पंडित चतुर्भुज राठौड़ शास्त्रीय संगीत के एक प्रख्यात दिग्गज थे। विनोद ने अपने भाई रूप कुमार राठौड़ के साथ मिलकर संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता से ही प्राप्त की थी। एक (Musical Heritage) से ताल्लुक रखने के बावजूद विनोद ने कभी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा और शास्त्रीय बारीकियों को फिल्मी गानों में पिरोने का हुनर सीखा। यही कारण था कि उनकी आवाज में एक अलग तरह की गहराई और वजन महसूस होता था।
सपनों का शहर मुंबई और शुरुआती संघर्ष की दास्तां
संगीत की शिक्षा पूरी करने के बाद विनोद अपने भाई के साथ सपनों की नगरी मुंबई आ गए। यहां उनके करियर की शुरुआत फिल्म ‘रूप की रानी चोरों का राजा’ से हुई, लेकिन उन्हें वह बड़ी पहचान नहीं मिल पाई जिसकी उन्हें तलाश थी। विनोद राठौड़ के (Bollywood Career Growth) में असली उछाल शाहरुख खान की फिल्म ‘दीवाना’ से आया। इस फिल्म के गीत ‘ऐसी दीवानगी देखी नहीं कहीं’ ने उनकी आवाज को घर-घर में लोकप्रिय बना दिया। इसके बाद ‘बाजीगर’ का गाना ‘ऐ मेरे हमसफर’ ने यह साबित कर दिया कि वह इंडस्ट्री के एक लंबी रेस के घोड़े हैं।
जब मुन्नाभाई की आवाज बनकर छा गए विनोद
संजय दत्त के साथ विनोद राठौड़ का कनेक्शन केवल ‘खलनायक’ तक सीमित नहीं रहा। सालों बाद जब ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ आई, तब भी विनोद ने अपनी आवाज का जादू बिखेरा और गाने सुपरहिट रहे। अपने शानदार सफर में उन्होंने 320 से अधिक फिल्मों में 3500 से ज्यादा गानों को अपनी आवाज दी। (Film Industry Statistics) के लिहाज से यह एक अविश्वसनीय रिकॉर्ड है। गोविंदा से लेकर शाहरुख तक की आवाज बनने वाले विनोद ने हर मूड के गाने गाए, चाहे वह कॉमेडी हो, रोमांस हो या फिर ‘शक्तिमान’ जैसे आइकॉनिक शो का थीम सॉन्ग।
सफलता के शिखर पर निजी जीवन की त्रासदी
जब विनोद राठौड़ का करियर ऊंचाइयों को छू रहा था, तभी उनके व्यक्तिगत जीवन में एक ऐसा तूफान आया जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर कर रख दिया। कई साल पहले उनकी पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी, जिसने गायक को गहरी निराशा और अकेलेपन में धकेल दिया। इस (Personal Tragedy) के कारण विनोद काफी समय तक डिप्रेशन में रहे और खुद को दुनिया से काट लिया। शोहरत की चकाचौंध के पीछे छिपा यह दर्द बहुत कम लोग जानते हैं, जिसने उनके हंसते-खेलते संसार को उजाड़ कर रख दिया था।
हक की शोहरत से आज भी महरूम हैं विनोद राठौड़?
हजारों गानों और सुपरहिट फिल्मों के बावजूद विनोद राठौड़ को वह ‘स्टारडम’ कभी नहीं मिला जो उदित नारायण या कुमार सानू जैसे उनके समकालीन गायकों को मिला। संगीत प्रेमियों का मानना है कि विनोद एक (Underrated Singer) बनकर रह गए। उनकी आवाज में वो वर्सटैलिटी थी जो किसी भी अभिनेता पर फिट बैठती थी, लेकिन इंडस्ट्री के समीकरणों और निजी दुखों ने उन्हें वह मुकाम नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। आज भी जब कोई ‘खलनायक’ फिल्म का गाना गुनगुनाता है, तो आवाज विनोद की ही गूंजती है, भले ही चेहरा किसी और का याद आए।
गुमनामी के बीच यादों का सरमाया
विनोद राठौड़ की कहानी बॉलीवुड के उन कलाकारों की याद दिलाती है जो पर्दे के पीछे रहकर फिल्म को हिट कराते हैं लेकिन खुद लाइमलाइट से दूर हो जाते हैं। 320 फिल्मों में अपनी रूह फूंकने वाले इस गायक की (Legacy of Music) आज भी नई पीढ़ी के गायकों के लिए प्रेरणा है। भले ही आज वे फिल्मों में कम सक्रिय हों, लेकिन ‘शक्तिमान’ से लेकर ‘बाजीगर’ तक की उनकी आवाज आज भी करोड़ों दिलों की धड़कन बनी हुई है। विनोद राठौड़ का नाम संगीत के इतिहास में हमेशा एक ऐसे योद्धा के रूप में दर्ज रहेगा जिसने गम में भी सुरों को नहीं छोड़ा।