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MovieReview – ‘अल्फा’ ने बदली धारणा, दमदार एक्शन के साथ कहानी ने भी किया प्रभावित

MovieReview – लंबे समय से चर्चा में रही फिल्म ‘अल्फा’ आखिरकार सिनेमाघरों में पहुंच चुकी है। टीजर और ट्रेलर सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं। कई दर्शकों ने ट्रेलर को देखकर यह भी कहा कि फिल्म की पूरी कहानी पहले ही उजागर कर दी गई है। हालांकि रिलीज के बाद तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। यह फिल्म अपनी प्रस्तुति, एक्शन और कलाकारों के अभिनय के दम पर दर्शकों को बांधे रखने में काफी हद तक सफल दिखाई देती है। खास बात यह है कि यशराज के स्पाई यूनिवर्स की हालिया फिल्मों की तुलना में यह अधिक संतुलित और गंभीर नजर आती है।

करगिल की पृष्ठभूमि से शुरू होती है कहानी

फिल्म की शुरुआत वर्ष 1999 के करगिल युद्ध की घटनाओं से होती है। सेना के अधिकारी कर्नल विक्रांत कौल और कर्नल फतेह सिंह लखावत युद्ध के कठिन अनुभवों से गुजरते हैं। इसी दौरान एक विशेष वैज्ञानिक परियोजना ‘अल्फा’ का विचार सामने आता है, जिसका उद्देश्य सैनिकों की शारीरिक क्षमता को असाधारण स्तर तक पहुंचाना है। कहानी तब नया मोड़ लेती है जब परिस्थितियों के कारण इस सीरम का इस्तेमाल निजी जीवन से जुड़े एक फैसले में हो जाता है। इसके बाद जन्म लेने वाली बच्ची सीता की जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है और वही आगे चलकर कहानी का केंद्र बनती है। फिल्म में उसके अतीत, प्रशिक्षण और पारिवारिक रिश्तों के बीच का संघर्ष धीरे-धीरे सामने आता है।

कलाकारों ने निभाई अपनी भूमिकाएं प्रभावी ढंग से

फिल्म में आलिया भट्ट ने एक्शन और भावनात्मक दृश्यों के बीच अच्छा संतुलन बनाया है। उनके किरदार में आत्मविश्वास और संवेदनशीलता दोनों दिखाई देते हैं। शरवरी भी अपने हिस्से के दृश्यों में प्रभाव छोड़ती हैं और एक्शन सीक्वेंस में उनकी मौजूदगी कहानी को मजबूती देती है। अनिल कपूर अपने अनुभवी अभिनय से फिल्म को स्थिरता प्रदान करते हैं। बॉबी देओल का किरदार प्रभावशाली होने की क्षमता रखता है, लेकिन कुछ संवाद और बोली का प्रयोग कई जगह स्वाभाविक नहीं लगता। दिव्येंदु अपने सीमित स्क्रीन टाइम में भी असर छोड़ते हैं। वहीं ऋतिक रोशन का विशेष कैमियो स्पाई यूनिवर्स से जुड़े दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है।

निर्देशन ने रखा कहानी का गंभीर स्वर

निर्देशक शिव रवैल ने फिल्म को अनावश्यक ग्लैमर और अतिरिक्त मेलोड्रामा से दूर रखने की कोशिश की है। कहानी का फोकस मिशन, किरदारों के उद्देश्य और एक्शन पर बना रहता है। लगभग दो घंटे बीस मिनट की अवधि वाली फिल्म अपनी गति बनाए रखती है। हालांकि कथानक कई स्थानों पर अनुमानित लगता है और कुछ घटनाओं में अधिक गहराई की गुंजाइश महसूस होती है। कुछ एक्शन दृश्यों में रचनात्मक स्वतंत्रता जरूरत से ज्यादा दिखाई देती है, जिससे यथार्थ का प्रभाव थोड़ा कम हो जाता है।

तकनीकी पक्ष और एक्शन फिल्म की बड़ी ताकत

फिल्म का एक्शन डिजाइन इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। कई दृश्यों में कैमरे का इस्तेमाल अलग अंदाज में किया गया है, जिससे बड़े पर्दे पर दृश्य प्रभावशाली लगते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक एक्शन सीक्वेंस का प्रभाव बढ़ाता है और तनावपूर्ण माहौल बनाने में मदद करता है। दूसरी ओर, फिल्म के गाने कहानी में बहुत अधिक यादगार छाप नहीं छोड़ते। कुछ दर्शकों को बॉबी देओल के किरदार की पृष्ठभूमि और उसके प्रस्तुतिकरण पर सवाल भी महसूस हो सकते हैं।

देखें या नहीं

अगर आपको बड़े पर्दे पर एक्शन, स्पाई ड्रामा और मजबूत महिला किरदारों वाली फिल्में पसंद हैं, तो ‘अल्फा’ एक बार देखी जा सकती है। कहानी पूरी तरह अप्रत्याशित नहीं है, लेकिन प्रस्तुति, कलाकारों का प्रदर्शन और एक्शन इसे रोचक बनाए रखते हैं। रिलीज से पहले जिस तरह की आलोचना फिल्म को मिली थी, उसके मुकाबले अंतिम परिणाम कहीं अधिक संतुलित और मनोरंजक नजर आता है। स्पाई यूनिवर्स की आगामी कड़ियों में रुचि रखने वाले दर्शकों के लिए भी यह फिल्म अहम कड़ी साबित हो सकती है।

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