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Javed Akhtar Biography and Struggles: 18 बीयर की बोतलें और जूतों की चाकरी, पढ़ें जावेद अख्तर की जिंदगी के वो किस्से जो रूह कंपा दें…

Javed Akhtar Biography and Struggles: महज 19 साल की कच्ची उम्र में ग्वालियर का एक दुबला-पतला लड़का आंखों में गुरु दत्त जैसे दिग्गज का असिस्टेंट बनने का ख्वाब लेकर मायानगरी पहुंचा था। लेकिन नियति ने उसके लिए (early life challenges) की एक ऐसी बिसात बिछाई थी जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। मुंबई पहुंचने के कुछ ही महीनों के भीतर गुरु दत्त साहब का साया दुनिया से उठ गया और वह लड़का सड़क पर आ गया। आज वही शख्सियत अपनी जादुई कलम के दम पर 81वें जन्मदिन का जश्न मना रही है।

Javed Akhtar Biography and Struggles
Javed Akhtar Biography and Struggles

जब जूतों और कपड़ों के बीच सिमट गई थी दुनिया

मशहूर शायरों के खानदान से ताल्लुक रखने के बावजूद जावेद अख्तर ने कभी अपने रसूख का इस्तेमाल नहीं किया। काम की तलाश में जब वे एक स्टूडियो पहुंचे तो उन्हें असिस्टेंट डायरेक्टर की नौकरी तो मिली, लेकिन वह (film industry assistant roles) आज की तरह ग्लैमरस नहीं थे। उन्हें हीरो-हीरोइन के जूते उठाने और उनके कोट संभालकर लाने जैसे छोटे काम करने पड़ते थे। आज के दौर के असिस्टेंट्स को स्टार्स के साथ बराबरी से बैठते देख वे अक्सर हैरान रह जाते हैं।

फुटपाथ की नींद और दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद

जावेद अख्तर की कामयाबी की इमारत उन रातों की बुनियाद पर खड़ी है जो उन्होंने दादर और बांद्रा के फुटपाथों पर बिताई थीं। संघर्ष के दिनों में (homelessness in Mumbai) का दर्द झेलते हुए वे कई बार रेलवे स्टेशनों और पार्कों में सोए। पैसे इतने कम थे कि कई बार दादर से बांद्रा का सफर पैदल ही तय करना पड़ता था क्योंकि जेब में बस के किराए तक के पैसे नहीं होते थे। दो-दो दिनों तक भूखा रहना उस दौर में उनके लिए आम बात थी।

सलीम-जावेद की वो जोड़ी जिसने इतिहास रच दिया

संघर्ष की भट्टी में तपकर जब जावेद अख्तर ने सलीम खान के साथ हाथ मिलाया, तो भारतीय सिनेमा को उसकी सबसे ताकतवर लेखनी मिली। इस (legendary scriptwriting duo) ने ‘शोले’, ‘दीवार’ और ‘डॉन’ जैसी कालजयी फिल्में लिखकर राइटर्स को इंडस्ट्री में वो सम्मान दिलाया जिसके वे हकदार थे। उन्होंने सिनेमा को ‘एंग्री यंग मैन’ का वो किरदार दिया जिसने अमिताभ बच्चन को सुपरस्टार और भारतीय दर्शकों को उनका मसीहा दे दिया।

गीतों की महफिल में ‘सिलसिला’ का वो पहला नगमा

पटकथा लेखन में झंडे गाड़ने के बाद जावेद अख्तर की रूह में बसी शायरी ने गीतों का रूप लेना शुरू किया। साल 1981 में आई फिल्म ‘सिलसिला’ के लिए उन्होंने अपना (first Bollywood song lyrics) ‘देखा एक ख्वाब’ लिखा, जो आज भी प्रेमियों की पहली पसंद है। इसके बाद ‘कल हो न हो’ और ‘संदेसे आते हैं’ जैसे गीतों ने उन्हें केवल एक लेखक नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा गीतकार बना दिया।

नशे की वो लत और 18 बीयर की बोतलों का सच

जावेद अख्तर की जिंदगी का एक दौर ऐसा भी था जब वे शराब के नशे में पूरी तरह डूब चुके थे। उन्होंने खुद कुबूल किया है कि वे एक बार में 18 (excessive alcohol consumption) बीयर की बोतलें पी जाते थे। जब बीयर से पेट फूलने लगा तो उन्होंने रम और व्हिस्की का सहारा लेना शुरू कर दिया। वे अकेले बैठकर पीने के शौकीन थे और इस लत ने उनकी निजी जिंदगी में कई तूफान खड़े कर दिए थे।

शराब की भेंट चढ़ गई पहली शादी की खुशियां

जावेद साहब आज अपनी पुरानी गलतियों पर पछतावा महसूस करते हैं और मानते हैं कि उनकी पहली शादी टूटने के पीछे नशे का बड़ा हाथ था। शराब के प्रभाव में की गई (failed marriage reasons) और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार ने उनके परिवार को उनसे दूर कर दिया। नशे की हालत में बेकार के मुद्दों पर बहस करना और अपनों को निराश करना आज भी उनके दिल में एक गहरी टीस बनकर जिंदा है।

कमल स्टूडियो का वो कमरा और 50 रुपये की पगार

अपने करियर की शुरुआत में उन्होंने कमाल अमरोही के साथ काम करते हुए मात्र 50 रुपये महीने की तनख्वाह पर गुजारा किया था। उस दौरान (struggling phase income) इतनी कम थी कि सर्वाइवल ही सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया था। कमल स्टूडियो का परिसर कई बार उनके सिर छिपाने का सहारा बना। वे अक्सर सोचते थे कि अगर कभी उनकी जीवनी लिखी गई, तो ये गरीबी के दिन सबसे अहम हिस्सा होंगे।

खानदानी विरासत और शायरी का वो लहू

जावेद अख्तर के खून में शायरी पीढ़ियों से रची-बसी है; उनके पिता जां निसार अख्तर और दादा मुजतर खैराबादी अपने समय के बड़े नाम थे। इस (poetic family heritage) ने उन्हें शब्दों के चयन और भावनाओं को पिरोने की वो कला दी जो विरले ही किसी के पास होती है। ग्वालियर की मिट्टी से जो अल्फाज निकले, उन्होंने सरहद पार तक अपनी धमक सुनाई और उन्हें एक वैश्विक शायर बना दिया।

81 के पड़ाव पर एक मुकम्मल इंसान

आज जावेद अख्तर शराब को पूरी तरह त्याग चुके हैं और अपनी गलतियों से सीखकर एक नई राह पर हैं। वे आज की पीढ़ी के लिए (inspirational success story) का सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जो सिखाता है कि सफलता के शिखर पर पहुंचने के लिए कांटों भरे रास्तों से गुजरना ही पड़ता है। उनकी कलम आज भी उतनी ही पैनी है और उनके विचार आज भी उतने ही बेबाक हैं, जो उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करते हैं।

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