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TradeGrowth – भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना चीन, बदला समीकरण

TradeGrowth – वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के वैश्विक व्यापार परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। चीन ने अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बनने का स्थान हासिल कर लिया है। उद्योग और वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, भारत और चीन के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 151.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह बदलाव न केवल व्यापारिक संबंधों की दिशा को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक आर्थिक संतुलन में भी एक नए रुझान की ओर संकेत करता है।

चीन के साथ व्यापार में तेज़ उछाल

आंकड़ों के अनुसार, बीते वित्त वर्ष में चीन को भारत का निर्यात उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। यह करीब 36.66 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 19.47 अरब डॉलर तक पहुंच गया। वहीं, चीन से आयात भी 16 प्रतिशत बढ़कर 131.63 अरब डॉलर दर्ज किया गया। इस बढ़ते आयात ने कुल व्यापार को तो मजबूत किया है, लेकिन इसके साथ ही असंतुलन भी गहरा हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और कच्चे माल के आयात में वृद्धि इसका प्रमुख कारण रही है।

रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा व्यापार घाटा

भारत और चीन के बीच बढ़ते व्यापार के साथ-साथ व्यापार घाटा भी चिंता का विषय बन गया है। वर्ष 2025-26 में यह घाटा बढ़कर 112.16 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष 99.2 अरब डॉलर था। यह अंतर बताता है कि भारत का आयात, निर्यात की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से बढ़ रहा है। आर्थिक जानकारों के अनुसार, घरेलू विनिर्माण को मजबूत किए बिना इस असंतुलन को कम करना आसान नहीं होगा।

अमेरिका के साथ व्यापारिक स्थिति में बदलाव

पिछले चार वर्षों तक भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा अमेरिका अब दूसरे स्थान पर खिसक गया है। 2025-26 में अमेरिका को भारत का निर्यात मामूली रूप से 0.92 प्रतिशत बढ़कर 87.3 अरब डॉलर रहा। दूसरी ओर, अमेरिका से आयात 15.95 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 52.9 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसके चलते भारत का व्यापार अधिशेष घटकर 34.4 अरब डॉलर रह गया, जो एक वर्ष पहले 40.89 अरब डॉलर था। यह संकेत देता है कि अमेरिका के साथ भी व्यापार संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है।

अन्य देशों के साथ निर्यात में गिरावट

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई प्रमुख देशों के साथ भारत के निर्यात में कमी दर्ज की गई है। इनमें नीदरलैंड, ब्रिटेन, सिंगापुर, बांग्लादेश, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका और मलेशिया शामिल हैं। यह गिरावट वैश्विक मांग में कमी, आर्थिक अनिश्चितताओं और क्षेत्रीय व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के कारण मानी जा रही है। निर्यात में यह कमी भारत के कुल व्यापार प्रदर्शन पर भी असर डाल सकती है।

कुछ देशों से आयात में बढ़ोतरी

जहां कुछ देशों के साथ निर्यात घटा है, वहीं कई देशों से आयात में तेज़ी देखी गई है। रूस, इराक, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, कतर और ताइवान जैसे देशों से आयात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। ऊर्जा संसाधन, खनिज और औद्योगिक कच्चे माल की बढ़ती मांग इसके पीछे की बड़ी वजह मानी जा रही है। इससे भारत की ऊर्जा और उत्पादन जरूरतें तो पूरी हो रही हैं, लेकिन व्यापार संतुलन पर दबाव भी बढ़ रहा है।

बदलते व्यापारिक समीकरण का व्यापक असर

चीन का फिर से शीर्ष स्थान पर पहुंचना यह दर्शाता है कि वैश्विक व्यापारिक रिश्ते लगातार बदल रहे हैं। इससे भारत को अपने निर्यात को विविध बनाने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि दीर्घकालिक रणनीति के तहत व्यापार संतुलन सुधारना और नए बाजार तलाशना अब प्राथमिकता होनी चाहिए।

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