Prohibition – बिहार में शराबबंदी पर फिर तेज हुई सियासी बहस
Prohibition – बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर सियासत गरमा गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में लागू की गई इस नीति पर अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर से ही सवाल उठने लगे हैं। ताजा बयान जदयू के सीतामढ़ी सांसद देवेश चंद्र ठाकुर का है, जिन्होंने साफ कहा कि अच्छी मंशा से शुरू की गई यह व्यवस्था व्यवहारिक तौर पर सफल नहीं हो सकी। इससे पहले भी सहयोगी दलों के कई नेता शराबबंदी की समीक्षा या इसे समाप्त करने की मांग उठा चुके हैं, जिससे राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है।

जदयू सांसद का खुला बयान
देवेश चंद्र ठाकुर ने एक समाचार चैनल से बातचीत में कहा कि अगर शराबबंदी हटती है तो बेहतर होगा। उनका तर्क था कि दुनिया में कहीं भी पूर्ण शराबबंदी लंबे समय तक सफल नहीं रही। उन्होंने माना कि मुख्यमंत्री का उद्देश्य सामाजिक सुधार था, क्योंकि शराब के कारण परिवारों में कलह, घरेलू हिंसा और आर्थिक नुकसान जैसी समस्याएं सामने आती हैं। खासकर गरीब परिवारों में बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ता है। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि जमीनी हकीकत अलग है और राज्य में अब भी शराब की उपलब्धता बनी हुई है।
सहयोगी दलों से उठती आवाजें
यह पहला मौका नहीं है जब सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर से ऐसी मांग उठी हो। केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी पहले भी शराबबंदी की प्रभावशीलता पर सवाल उठा चुके हैं। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के विधायक दल के नेता माधव आनंद ने विधानसभा में नीति की समीक्षा की मांग की थी। वहीं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और भाजपा विधायक विनय बिहारी ने भी समय-समय पर इस कानून की समीक्षा की आवश्यकता बताई है। इन बयानों से स्पष्ट है कि मुद्दा केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रहा।
सीमावर्ती राज्यों का तर्क
देवेश ठाकुर ने पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल का उल्लेख करते हुए कहा कि खुली सीमाओं के कारण अवैध शराब की आवाजाही पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल है। उनका कहना था कि ट्रकों और अन्य वाहनों के जरिए शराब की तस्करी लगातार जारी है। ऐसे में पूर्ण प्रतिबंध को प्रभावी ढंग से लागू करना व्यावहारिक चुनौती बन गया है। उन्होंने यह भी बताया कि विधानमंडल में शराब न पीने की शपथ के दौरान वे उपस्थित नहीं थे और इस संबंध में मुख्यमंत्री से उनकी बातचीत भी हुई थी।
कानून लागू होने के बाद की स्थिति
बिहार में वर्ष 2016 में शराबबंदी लागू की गई थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार तब से अब तक 10 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं और करीब 16 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया है। लगभग 4.5 करोड़ लीटर शराब जब्त की जा चुकी है। इसके बावजूद गांव से लेकर शहर तक अवैध बिक्री की खबरें सामने आती रही हैं। सरकार को हर साल हजारों करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का अनुमान है, जबकि अवैध कारोबार ने समानांतर नेटवर्क खड़ा कर लिया है।
जहरीली शराब और प्रशासनिक चुनौती
अवैध तरीके से तैयार की गई शराब के कारण कई बार जहरीली शराब की घटनाएं भी हुई हैं, जिनमें कई लोगों की जान जा चुकी है। इससे प्रशासन की कार्यप्रणाली और निगरानी तंत्र पर भी सवाल उठे हैं। हालांकि सरकार की ओर से अब तक यह स्पष्ट किया गया है कि शराबबंदी की समीक्षा का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। संसदीय कार्य मंत्री विजय चौधरी ने विधानसभा में कहा था कि नीति जारी रहेगी।
आगे क्या संकेत
लगातार बढ़ती राजनीतिक आवाजों के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार अपने रुख में कोई बदलाव करती है या नहीं। फिलहाल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सार्वजनिक रूप से शराबबंदी के पक्ष में ही नजर आते हैं। लेकिन गठबंधन के भीतर उठती बहस ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि आने वाले समय में यह मुद्दा राज्य की राजनीति के केंद्र में रह सकता है।



