LiquorBan – शराबबंदी की समीक्षा पर विधान परिषद में तीखी बहस
LiquorBan – बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर राजनीतिक माहौल गरम हो गया है। कुछ नेताओं द्वारा राज्य में लागू पूर्ण शराबबंदी की समीक्षा की मांग उठाए जाने के बाद सत्ता पक्ष ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया है। जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता और विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार ने सदन में इस मुद्दे पर सवाल खड़े करते हुए समीक्षा की मांग करने वालों से स्पष्ट रुख बताने को कहा।

सदन में उठे तीखे सवाल
विधान परिषद की कार्यवाही के दौरान नीरज कुमार ने कहा कि जो लोग शराबबंदी की समीक्षा की बात कर रहे हैं, वे यह बताएं कि किस आधार पर बदलाव चाहते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि शराब के दुष्प्रभाव समाज पर व्यापक रूप से देखे गए हैं और इसके कारण कई सामाजिक व स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या शराब से बीमारियां कम होती हैं या घरेलू हिंसा में कमी आती है। उनका कहना था कि ऐसे मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी के बजाय सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
समीक्षा की मांग पर नैतिक सवाल
नीरज कुमार ने यह भी कहा कि जो नेता समीक्षा की मांग कर रहे हैं, वे अपने परिवार की महिलाओं और बच्चों के सामने यह स्पष्ट करें कि वे किस उद्देश्य से यह प्रस्ताव रख रहे हैं। उनका इशारा इस ओर था कि शराबबंदी का असर केवल कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सामाजिक ताना-बाना से भी गहरा संबंध है। उन्होंने कहा कि नीति की आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इसके परिणामों पर भी खुलकर चर्चा होनी चाहिए।
सरकार का पक्ष
संसदीय कार्य मंत्री विजय कुमार चौधरी ने भी सदन में सरकार का रुख साफ किया। उन्होंने कहा कि राज्य में शराब पीना और उसकी बिक्री करना कानूनन अपराध है, और सरकार ने इसे रोकने के लिए स्पष्ट प्रावधान किए हैं। यदि कहीं अवैध बिक्री की शिकायत मिलती है तो उसे रोकना प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। मंत्री ने यह भी कहा कि किसी भी दुर्घटना या मौत को बिना पुष्टि के शराब से जोड़ देना उचित नहीं है। उन्होंने सभी दलों से कानून के पालन में सहयोग की अपील की।
सदन में नोकझोंक
बहस के दौरान कुछ समय के लिए वातावरण गर्म हो गया। नीरज कुमार और अन्य सदस्य के बीच तीखी टिप्पणियां भी हुईं, जिससे कार्यवाही में हल्का व्यवधान आया। हालांकि बाद में अध्यक्ष के हस्तक्षेप से चर्चा आगे बढ़ी। यह बहस इस बात का संकेत है कि शराबबंदी का मुद्दा अब भी राज्य की राजनीति में अहम स्थान रखता है।
राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ
बिहार में पूर्ण शराबबंदी 2016 से लागू है। सरकार इसे महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक सुधार से जोड़कर देखती रही है, जबकि विपक्ष के कुछ नेता समय-समय पर इसके प्रभाव और क्रियान्वयन की समीक्षा की मांग करते रहे हैं। हाल की बहस ने एक बार फिर इस नीति के पक्ष और विपक्ष में तर्कों को सामने ला दिया है।
फिलहाल सरकार अपने रुख पर कायम है और कानून के सख्त पालन की बात दोहरा रही है। आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना रह सकता है।



