UP Police Lathi Charge on Prabhat Pheri: 50 साल पुरानी आस्था पर पुलिस की लाठी, खून बहा तो बैकफुट पर आया प्रशासन…
UP Police Lathi Charge on Prabhat Pheri: उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में माघ के पवित्र महीने में भक्ति का स्वर उस समय चीखों में बदल गया जब पुलिस ने दशकों पुरानी परंपरा को रोकने की कोशिश की। इस्लामनगर थाना क्षेत्र के ग्राम ब्योर कासिमाबाद में शुक्रवार की तड़के (Religious Harmony in UP) की भावना को ठेस पहुंची जब पुलिस ने 50 वर्षों से निकल रही प्रभात फेरी का रास्ता रोक दिया। श्रद्धालु भगवान के भजनों में लीन थे, लेकिन अचानक भारी पुलिस बल ने उन्हें आगे बढ़ने से मना कर दिया, जिससे गांव में तनाव की स्थिति पैदा हो गई।

दशकों पुरानी परंपरा और विवाद की असली जड़
ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि यह प्रभात फेरी आज की नहीं बल्कि आधी सदी पुरानी है जिसे वे अपने पूर्वजों के समय से निकालते आ रहे हैं। इस (Traditional Rituals) के मार्ग को लेकर पिछले कुछ समय से खींचतान चल रही थी, लेकिन ग्रामीणों ने कभी नहीं सोचा था कि अपनी ही जमीन पर उन्हें इबादत या पूजा के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। पुलिस का तर्क था कि यह मार्ग विवादित है, जबकि ग्रामीण इसे अपनी आस्था का अभिन्न हिस्सा मान रहे थे।
आधी रात के बाद शुरू हुआ शिकायतों का दौर
इस पूरे विवाद की पटकथा एक दिन पहले ही लिख दी गई थी जब दूसरे समुदाय के कुछ लोगों ने प्रभात फेरी के रूट पर आपत्ति जताई थी। स्थानीय निवासियों का कहना है कि (Community Dispute Resolution) की प्रक्रिया अपनाने के बजाय पुलिस ने सीधे बल प्रयोग का रास्ता चुना। गुरुवार को भी तनाव की स्थिति बनी थी, लेकिन शुक्रवार की सुबह मामला पूरी तरह हाथ से निकल गया जब पुलिस बल गांव को छावनी में तब्दील करने पहुंच गया।
लाठीचार्ज से दहल उठा ब्योर कासिमाबाद गांव
सुबह के लगभग पांच बजे थे जब ग्रामीण अपनी प्रभात फेरी निकालने पर अड़ गए और पुलिस उन्हें पीछे धकेलने लगी। देखते ही देखते बिल्सी और उघैती थानों की पुलिस के साथ पीएसी बटालियन ने मोर्चा संभाल लिया। करीब आठ बजे (Police Force Deployment) के बीच अचानक लाठीचार्ज शुरू हो गया। पुलिस की लाठियां बुजुर्गों, युवाओं और महिलाओं पर बेरहमी से बरसीं, जिसके बाद गांव की गलियों में भगदड़ मच गई और चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल पैदा हो गया।
घायल महिलाओं और युवाओं की चीख से कांपा प्रशासन
पुलिस की इस कार्रवाई में कई ग्रामीण गंभीर रूप से घायल हुए हैं जिन्हें आनन-फानन में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि (Human Rights Violation) जैसी स्थिति वहां दिखाई दे रही थी क्योंकि निहत्थे श्रद्धालुओं पर पुलिस ने बल प्रयोग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अस्पताल में भर्ती घायल महिलाएं और उनके परिजन अब भी दहशत में हैं और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
सपा शासन काल की वो टीस जो फिर उभर आई
गांव के बुजुर्गों का आरोप है कि इस विवाद के पीछे राजनीति की गहरी जड़ें हैं। लगभग दस वर्ष पूर्व सपा सरकार के कार्यकाल के दौरान एक विशेष समुदाय की आपत्ति के बाद इस (Political Influence on Tradition) के तहत प्रभात फेरी का मार्ग बदल दिया गया था। इस साल ग्रामीणों ने संकल्प लिया था कि वे अपने उसी पुराने और पारंपरिक मार्ग से फेरी निकालेंगे, जिसे प्रशासन ने सुरक्षा और शांति व्यवस्था का हवाला देकर बाधित कर दिया।
अधिकारियों की मौजूदगी और ग्रामीणों का भारी हंगामा
हालात बेकाबू होते देख एसडीएम बिसौली राशि कृष्णा और सीओ बिल्सी मौके पर पहुंचे। इसके बाद एसपी देहात हृदेश कठेरिया भी घटनास्थल पर पहुंचे ताकि स्थिति को शांत किया जा सके। ग्रामीणों का गुस्सा (Public Outrage) के रूप में फूट पड़ा और उन्होंने साफ कह दिया कि जब तक दोषी पुलिसकर्मियों पर गाज नहीं गिरेगी, वे पीछे नहीं हटेंगे। गांव में तनाव इतना अधिक था कि प्रशासन को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी।
पुलिस का यू-टर्न और बैकफुट पर आया प्रशासन
जब अधिकारियों ने देखा कि जन आक्रोश किसी भी समय बड़ी हिंसा का रूप ले सकता है, तो उन्होंने तुरंत अपनी गलती सुधारी। काफी गहमा-गहमी के बाद पुलिस (Administrative Accountability) को समझते हुए बैकफुट पर आ गई। अधिकारियों ने स्वीकार किया कि यह मार्ग वास्तव में दशकों पुराना है। अंततः पुलिस के साये में ही प्रभात फेरी को उसी पुराने रास्ते से निकाला गया जिसे सुबह विवादित बताकर रोका गया था।
एसपी देहात का बयान और भविष्य की सुरक्षा
एसपी देहात डॉ. हृदेश कठेरिया ने पूरे मामले पर सफाई देते हुए कहा कि शुरुआत में विरोध की सूचना पर शांति बनाए रखने के लिए फेरी रोकी गई थी। बाद में जब (Investigation and Verification) की प्रक्रिया पूरी हुई और पता चला कि यह रास्ता वर्षों से इस्तेमाल हो रहा है, तो तत्काल अनुमति दे दी गई। उन्होंने आश्वासन दिया कि भविष्य में प्रभात फेरी पर किसी भी तरह की रोक नहीं रहेगी और ग्रामीण अपनी परंपरा का पालन कर सकेंगे।
न्याय की मांग पर अड़े ग्रामीण और पसरा सन्नाटा
प्रभात फेरी तो निकल गई, लेकिन गांव में अभी भी भारी पुलिस बल तैनात है। घायल ग्रामीणों के परिजन अब भी इस बात पर अड़े हैं कि जिन पुलिसकर्मियों ने महिलाओं पर हाथ उठाया है, उन्हें निलंबित किया जाए। यह (Social Justice seeking) की लड़ाई अब गांव की गलियों से निकलकर प्रशासनिक गलियारों तक पहुंचने वाली है, क्योंकि ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि वे इस अपमान और चोट को आसानी से नहीं भूलेंगे।



